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हमें भी न आया 

 

तू ऐसा बीज थी

जिसे न मिली धूप

न हवा, न पानी

और न कोई खाद 

फिर भी तू पनपी 

पनपी ही नही  

बन गयी एक पेड़

बरगद सी छाया

 

फिर तूने बसाया

अपना संसार 

और कहलाई माँ

फिर बांटी तेजस धूप

पवन में भरी गंध

दूध से सींचे पौधे

हृदय को मथकर

लाई खाद

हुए तेरे

लख-लख पूत आबाद

 

एक बार फिर

व्यर्थ हुयी माँ

वह तेरी तपस्या

वह तेरा त्याग

क्योंकि

पुरुष होने के अहम् में    

‘बीज’ की कद्र करना

फिर भी हमें न आया I

(मौलिक  व् अप्रकाशित)_  

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Comment

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Comment by shree suneel on July 12, 2015 at 9:21pm
बहुत अच्छी सुन्दर कविता आदरणीय. सच है.. अपने विकास - क्रम में हर स्तर पर वो बीज आहत होता है. जो कद्र होनी चाहिए उसकी उससे बंचित रहता है.
हार्दिक बधाई आपको इस प्रस्तुति पर.
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 10, 2015 at 9:21am

aadarneey Pari M Shlok jee

aapkaa  aabhaar

Comment by Pari M Shlok on July 9, 2015 at 3:13pm
बेहद सारगर्भित कविता बधाई
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 8, 2015 at 8:56pm

आ० चौहान जी

आभारी हूँ. सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 8, 2015 at 8:55pm

आदरणीय निकोर जी

आपको प्रणाम सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 8, 2015 at 8:55pm

आ० कांता राय जी

आपका समर्थन  स्वागत योग्य है .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 8, 2015 at 8:54pm

आ० विनय जी

बहुत आभार .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 8, 2015 at 8:53pm

आ० मिथिलेश जी

बहुत धन्यवाद .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 8, 2015 at 8:53pm

आदरणीय सविता जी

सादर आभार.

Comment by narendrasinh chauhan on July 8, 2015 at 6:37pm

अति सुन्दर रचना

आदरणीय गोपाल नारायन जी

कृपया ध्यान दे...

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