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ग़ज़ल- जतिंदर औलख

मेरे शब्दों के मायाजाल को तुम याद कर लेना,
दहकती आंधियों में फिर भले परवाज़ भर लेना।

हवा की महक होकर तुम मेरी सासों में बस जाना,
खुद को तुम खुदी से इस तरह आजाद कर लेना।

पवन हो तुम मैं बादल हूँ उडूंगा आसरे तेरे,
ज़माने के लिए रिश्ते का कुछ भी नाम रख लेना।

दुनीआ ने गिरा दिया नज़रों के परबत से हमे,
मुझ दरिया को सागर बन के तू बाँहों में भर लेना।

है सूखे बाग़ के लहजे में मुझको ख़ुदकुशी करनी,
आंधी बन के आने का कभी इकरार कर लेना।

आँख भरना बहक जाना बिखरना फूल पत्तियों से,
ग़ज़ल लिखनी अगर औलख तो ये काम कर लेना।
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by मोहन बेगोवाल on July 26, 2015 at 10:22am

  आदरणीय जतिंदर जी , बहुत ही भाव पूर्ण गज़ल पोस्ट करने की बधाई , धीरे धीरे बहुत कुछ सिखने को मिलेगा , एक बार फिर खुशामदीद 

Comment by Jatinder Aulakh on July 25, 2015 at 10:22pm
इस बेमिसाल हौसला अफ़ज़ाई के लिए बहुत शुक्रिया दोस्तों ।।।जरूर अभी नई नई लिखनी शुरू की है ।। जरूर सीखूँगा
Comment by Harash Mahajan on July 25, 2015 at 9:01pm

बहुत ही सुंदर भाव आपने अपनी अपनी कृति में दिए....!!

Comment by saalim sheikh on July 25, 2015 at 4:08pm

अच्छे शेर कहे हैं भाई ! लेकिन ग़ज़ल के एतबार से  कुछ जगह ग़लतियाँ हैं , मैं खुद अभी सीख रहा हूँ इसलिए ज्यादा नहीं कह सकता , आप चाहें तो यहाँ  ग़ज़ल की कक्षा जॉइन कर सकते हैं  ! 

Comment by Jatinder Aulakh on July 25, 2015 at 2:42pm
बहुत धन्यवाद Kanta Roy जी । हिंदी ग़ज़ल में अभी नया हूँ। मगर आपके शब्दों ने मुझे बहुत हिंमत दी है।
Comment by Jatinder Aulakh on July 25, 2015 at 2:13pm
बहुत धन्यवाद Kanta Roy जी । हिंदी ग़ज़ल में अभी नया हूँ। मगर आपके शब्दों ने मुझे बहुत हिंमत दी है।
Comment by kanta roy on July 25, 2015 at 9:38am
आँख भरना बहक जाना बिखरना फूल पत्तियों से,
ग़ज़ल लिखनी अगर औलख तो ये काम कर लेना........ दिल झूम उठा पढकर .... वाह !!! मुबारकाँ जी आदरणीय जतिंदर औलख साहब

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