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बिगड़ता है किसी का क्या?---(मिथिलेश वामनकर)

1222--1222—1222--1222

 

लगे बोली सियासत में, भला आम-आदमी का क्या?

निजाम-ए-मुल्क जो कह दे मगर इस अबतरी का क्या?                                 

 

अगर दो वक़्त की रोटी जुटा पाए तो बढ़िया है.

वगरना फिर मुझे करना तेरी दीवानगी का क्या?

 

बहुत रंगीन कर बैठे हो  नकली-ताजमहलों को

मगर सबसे जुरुरी है जो उसकी, सादगी का क्या?

 

अगर दे तो मुअज्ज़िज़* फित्रतन् खुद्दार दुश्मन दे                                     *सम्मानित 

मेरे कद का नहीं होगा, तो मतलब दुश्मनी का क्या?

 

मरासिम और कुछ वादें, कभी तुमसे किये थे जो

निभा लेते, मगर यारों करें कम-फुरसती का क्या?

 

ख़ुदा-हाफ़िज़ अजी कह लूं जरा साहिल से, ठहरो तो   

सफ़र ये है समंदर का, भरोसा वापसी का क्या?

 

बुलाते थे कभी तहजीब से, वो आज कहते है-

“जो महफ़िल में नहीं आओ, बिगड़ता है किसी का क्या?”

 

ये टुकड़े जिस्म के जलते हुए बिखरे पड़े है क्यों?

जो मजहब पे सियासत की, ये मंजर है उसी का क्या?

 

अमावस से चरागों की अजल से यारियां, सुन लो,

कभी सूरज के डूबे से  हुआ है रौशनी का क्या?

 

इसी डर में अगर जीते रहे तो जी लिए साहिब

यकीनन मौत होती है, भरोसा जिंदगी का क्या ?

 

जो झूठी दाद, नाकस वाहवाही के अदीबों में

रहे उलझे सुखनवर तो, भला हो शायरी का क्या?

 

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 1, 2015 at 11:54pm

आदरणीया आशुतोष जी, ग़ज़ल की मुक्तकंठ प्रशंसा और आत्मीय अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार. आपकी सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 1, 2015 at 11:52pm

आदरणीय सुशील सरनासर , ग़ज़ल पर आपकी सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया सदैव अच्छा लिखने को प्रोत्साहित करती है. आपको ग़ज़ल अच्छी लगी, दिल खुश हो गया, आपका हार्दिक आभार सर..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 1, 2015 at 11:44pm

आदरणीय राहुल भाई जी, ग़ज़ल की सराहना के लिए आभार 

Comment by Samar kabeer on August 1, 2015 at 11:44pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब,बहुत ही शानदार ग़ज़ल से नवाज़ा है आपने मंच को,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

"मुझे रब्बा! अगर दुश्मन भी दे तो खानदानी दे.
मेरे कद का नहीं होगा, तो मतलब दुश्मनी का क्या"

आपके इस शैर का ख़याल जनाब राहत इंदौरी साहिब के शैर से टकरा रहा है,उनका मिसरा है,

"ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझको ख़ानदानी चाहिये"।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 1, 2015 at 11:35pm
आदरणीय हर्ष जी आपकी आत्मीय प्रतिक्रिया और सराहना के लिए हार्दिक आभार। आपकी मुक्तकंठ प्रशंसा से दिल खुश हो गया। सादर
Comment by मनोज अहसास on August 1, 2015 at 5:23pm
सर
बेहद खूबसूरत
बेहद
लिखना सीख रहे है
आपसे
प्रशंसा करना नहीं आता है
बस नमन स्वीकार करें
सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 1, 2015 at 5:22pm

आदरणीया तनूजा उप्रेती जी, ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार....बहुत बहुत धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 1, 2015 at 4:34pm

आदरणीय विनय जी, ग़ज़ल पर आपकी सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया सदैव अच्छा लिखने को प्रोत्साहित करती है. आपको ग़ज़ल अच्छी लगी, दिल खुश हो गया.इस आत्मीय प्रशंसा के लिए  बहुत बहुत आभार आपका.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 1, 2015 at 3:36pm

आदरणीया राजेश दीदी, ग़ज़ल की मुक्तकंठ प्रशंसा और आत्मीय अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार. आपकी सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया सदैव मेरा मनोबल बढ़ाती है. हार्दिक आभार, नमन 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 1, 2015 at 3:27pm

बहुत रंगीन कर बैठे हो  नकली-ताजमहलों को

मगर सबसे जुरुरी है जो उसकी, सादगी का क्या?....बहुत बढ़िया 

मुझे रब्बा! अगर दुश्मन भी दे तो खानदानी दे.

मेरे कद का नहीं होगा, तो मतलब दुश्मनी का क्या?...कमाल की सोच 

ये टुकड़े जिस्म के जलते हुए बिखरे पड़े है क्यों?

जो मजहब पे सियासत की, ये मंजर है उसी का क्या?....बेहतरीन बेहतरीन 

आपकी इस ग़ज़ल के हर शेर की जितनी तारीफ़ की जाए कम है ..आपकी लिखने को सलाम के साथ सादर 

कृपया ध्यान दे...

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