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तेरी बातें (कविता)____मनोज कुमार अहसास

पढ़ा है दर्द की आँखों में तराना तेरा
तुझको मालूम हो शायद मेरा बेरंग सफ़र
मैंने हर लम्हा तेरी याद को पेशानी दी
तुझपे कुर्बान रही मेरी अकीदत की नज़र


मैं सुलगता हूँ तेरा साथ निभाने के लिए
हलाकि कुछ भी नही बाकि है जलने को इधर
ख़त्म हो चुकी इक रस्म की सांसो के लिए
ज़बी हर लम्हा ढूंढती है तेरी रहगुजर


तुझको पा लेना किसी हाल में मुमकिन ही न था
तुझको खोने की तमन्नाये उठी पर कैसे
जब थे मजबूर किसी बात की परवाह न थी
आज इन जमते हुए क़दमों को है डर कैसे


कितने बरसो तक छुपाया है जिनको सीने में
हाय! वें ज़ख़्म नुमायां ना कहीं हो जाये
तुझसे एक लफ़्ज़ गर जुड़ गया रुस्वाई का
इससे बेहतर है ये साँस दफ़न हो जाये


कितनी मजबूर हवाओ की निगहबानी है
जिनकी हर साँस में अहसास दरक जाते है
सर्द लगती है अंधेरो में झुलसती गर्मी
लफ़्ज़ जबभी तुझे छूते है बहक जाते है


इसलिए दिल की कोई बात बताने के लिए
अब मेरे दोस्त मेरे पास कोई राह नहीं
आखिरी बात तुझे कहने की तलब है ये
तू रहे खुश सदा जा मुझको तेरी चाह नहीं


हर तरफ मेरी अदावत की हवा चलती है
देख, आते है मेरा ज़ुर्म बताने वाले
पर तुझको मालूम है मेरी गुनहगारी का
ओ ज़माने भर को मुझे अच्छा बताने वाले


जी में आता है आज कोई फ़साना लिख दूँ
खत्म होने में नहीं आती है तेरी बातें
और सोचता हु सीधे सादे बयानों में कहूँ
तेरी बातें ,तेरी बाते ,बस तेरी बातें


मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by मनोज अहसास on August 10, 2015 at 3:55pm
आदरणीय मिथिलेश सर
बहुत आभार
दुःख के स्वर को आपने नज़्म कह दिया
ये आपकी कृपा है
नज़्म के विधान पर जानकारी कहाँ से मिल सकती है ये बताने की कृपा करें
आपके सुझाव सर माथे पर
पर मेरे भाव इन सुझावों में कहीं कही बहकते है
आपसे पुनः इस्लाह की चाह है
आभार
इनायत
सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 10, 2015 at 12:59pm

आदरणीय मनोज भाई आपकी नज़्म ने दिल लूट लिया. पूरी नज़्म गुनगुनाते हुए बस झूम गया. आपको इस शानदार प्रस्तुति पर दिल से बधाई .... नज़्म इतनी शानदार हुई है कि अब कोई छोटा सा ऐब भी अखरेगा... इसलिए जहाँ गेयता भंग है उस पंक्ति में थोड़ा बदलाव कर बोल्ड किया है देख लीजियेगा. सादर 

है पढ़ा दर्द की आँखों में तराना तेरा
तुझको मालूम हो शायद मेरा बेरंग सफ़र
मैंने हर लम्हा तेरी याद को पेशानी दी
तुझपे कुर्बान रही मेरी अकीदत की नज़र


मैं सुलगता हूँ तेरा साथ निभाने के लिए
हलाकि कुछ भी नही बाकि है जलने को इधर
ख़त्म होती हुई  इक रस्म भी सांसो के लिए
जब भी  हर लम्हा ढूंढती है तेरी राहगुजर


तुझको पा लेना किसी हाल में मुमकिन ही न था
तुझको खोने की तमन्नाये उठी फिर कैसे
जब थे मजबूर किसी बात की परवाह न थी
आज इन जमते हुए क़दमों को है डर कैसे


कितने बरसो से छुपाया है जिनको सीने में
हाय! वें ज़ख़्म नुमायां ना कहीं हो जाये
तुझसे इक लफ़्ज़ भी जुड़ता गया रुस्वाई का
इससे बेहतर है यहीं  साँस दफ़न हो जाये


कितनी मजबूर हवाओ की निगहबानी है
जिनकी हर साँस में अहसास दरक जाते है
सर्द लगती है अंधेरो में झुलसती गर्मी
लफ़्ज़ जब भी तुझे छूते है बहक जाते है


इसलिए दिल की कोई बात बताने के लिए
अब मेरे दोस्त मेरे पास कोई राह नहीं
आखिरी बात तुझे कहने की तलब है ये
तू रहे खुश सदा जा मुझको तेरी चाह नहीं


हर तरफ मेरी अदावत की हवा चलती है
देख, आते है मेरा ज़ुर्म बताने वाले
तुझको मालूम है मेरी भी गुनहगारी का
ओ ज़माने को मुझे अच्छा बताने वाले


जी में आता है कोई आज फ़साना लिख दूँ
खत्म होने में नहीं आती है तेरी बातें
और अब सोचता हूँ सीधे  बयानों में कहूँ
तेरी बातें ,तेरी बाते ,सभी  तेरी बातें

बहुत बढ़िया भाई जी इस रचना पर ढेर सारी दुआएं 

कृपया ध्यान दे...

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