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जो अभिमानवश अपना आकार बढ़ाना चाहता हैं , 
वो शायद भूल जाता है....
अहं का बढ़ता आकार ही तो अहंकार है ,
इसी वजह से द्रष्टा स्वयं को ,
दृश्य समझने की भूल करता हैं ,
जो यथार्थ में देखने वाला है , 
वह अपने को झरोखा समझ बैठता है ,
और वो अपना विस्तार प्रकृति के ,
निरंतर परिवर्तित होते हुए दृश्यों में करता है ,
इनके बनने पर स्वयं को बनता हुआ अनुभव करता हैं ,
और इनके मिटने पर स्वयं को मिटने का भय ,
ये पहेली कुछ उलझी हुई जरुर लगती है ,
परन्तु थोडा सा ध्यान दे तो समझ जायेंगे ,
ये सब अपने स्वयं के जीवन में ,
दैनिक घटना है और आती जाती हैं 

Views: 755

Comment

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Comment by Rash Bihari Ravi on April 19, 2011 at 5:05pm
dhanyabad yograj ji sauradh ji

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 18, 2011 at 11:51pm

अर्थपूर्ण और आध्यात्मिक विचारों से पगी रचना हेतु अनेकानेक बधाइयाँ..


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on April 16, 2011 at 7:23pm
बहुत सुन्दर विचार रवि भाई !
Comment by Rash Bihari Ravi on April 15, 2011 at 6:40pm
preetam ji anamika ji rajiv ji abhinav ji lata ji aur tilak raj ji is hausala afgai ke liye lakh lakh dhanyabad

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Tilak Raj Kapoor on April 14, 2011 at 10:46pm

खूबसूरत विचार।

 

Comment by Lata R.Ojha on April 14, 2011 at 9:37pm
kitni sundarta se aapne sandesh dia hai..:) waah !
Comment by Abhinav Arun on April 14, 2011 at 9:20pm
वाह बहुत खूब कविता लिखी गुरूजी आपने |
Comment by Rajeev Mishra on April 14, 2011 at 9:17pm

रवि भाई  शीर्षक  बहुत जबरजस्त और उससे जबर जास्त एक एक पंक्ति अपने आप मे सन्देश

 

Comment by Anamika on April 14, 2011 at 8:26pm
sach kaha aapne ahem ka badhta aakar hi to aakar hai.
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on April 14, 2011 at 7:42pm
bahut badhiya likha aapne guru jee

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