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मैं ग़ज़ल लिखूँ चाहे जो बह्र है काफ़िया बस एक तू।।

2121 22 2212 2212 2212
जो निगाहे हाला का है असर वो साक़िया बस एक तू।
मैं ग़ज़ल लिखूँ चाहे जो बह्र है काफ़िया बस एक तू।।

तेरे हुश्न साग़र में ये मेरा मन उतर कर तैरता।
इस मेरे इश्कां की नाव का है नाहिया बस एक तू।।

मेरा मन किसी भी दूजी बगिया में न अब जाता कभी।
मेरी इन निग़ाहों के ख़ाब की है बादिया बस एक तू।।


मेरी सांस हो मेरी आस मेरी धड़कनों की प्यास में।
मेरी ज़िन्दगी का हसीनतम है सानिया बस एक तू।।

तेरे नाम से होती सुबह तेरे नाम से ही शाम है।
मेरी दुआओं में हर घड़ी है साथिया बस एक तू।।

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 17, 2015 at 10:37am
इया
Comment by amod shrivastav (bindouri) on September 17, 2015 at 10:34am
नाहिया???
सानिया???
बादिया???

आदर नीय भैया जी
इंतजार करिए
गुणीजन जरूर राह दिखाए गे
Comment by amod shrivastav (bindouri) on September 17, 2015 at 10:28am
दादा नमन

नहिया??
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 17, 2015 at 10:11am
बहुत मेहनत करके एक बार फिर संशोधित रूप में ग़ज़ल प्रस्तुत है।
Comment by amod shrivastav (bindouri) on September 15, 2015 at 5:40pm
दादा सादर नमन
बधाई
आप की हर पंती बेहद भाव पूर्ण है
पर
दादा मैं जानकार तो नही फिर भी
जितना जानता हूँ
आप अपनी गजल एक बार जरूर देख ले
क्यों की गजल में मंत्रा भार उच्चारण प्रधान है
आप जहा कही भी मंतरा गिराये है
क्या वो गाते वक्त भी लघु हो रही है
अगर नही तो आप की गजल
बहर के दायरे में नहीं
अगर है तो मैं गलत हूँ

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