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स्वेटर (लघुकथा)

जनवरी की हड्डी कंपा देने वाली ठंड..मैं ऊपर से नीचे तक गर्म कपड़ों के बावजूद कांप रही थी ।कक्षा में पहुंच कर एक नजर, मेरे सम्मान में खड़े सभी बच्चों पर डाली और बैठने का इशारा किया । तभी मेरी नजर उन बच्चों पर पड़ी जिनके बदन पर कपड़ों के नाम पर बस कपड़ों का नाम था।मैंने उन सभी बच्चों को खड़ा कर दिया ।
"क्यों!स्वेटर कहां है तुम्हारे?स्कूल से स्वेटर के लिये पैसा मिला ना तुम लोगों को फिर..?"लहजा सख्त था । बच्चे सहम गये ।फिर सामने जो कहानी आई बेशक अलग-अलग थी लेकिन नतीजा एक,कि उनके अभिभावक सारा पैसा अपने निजी स्वार्थ पर खर्च कर चुके है ।और वो मासूम डांट के डर से सफाई दे रहे थे-"दीदी!गेहूं की फसल पर स्वेटर आ जायेगा"
"कब"मैंने हैरानी से पूछा ।
"दो महीना बाद "।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Rahila on December 4, 2015 at 4:32pm
बहुत आभार आदरणीया नीता दी! मैं ऐसे हालात में रह रहे बच्चों को करीब से देख रही हूं सच बहुत दुःखी हो जाती हूं ।
Comment by Nita Kasar on December 3, 2015 at 8:37pm
बालमन घर के हालात से जाने अनजाने कैसे सांमंजस्य बैठा लेता है ये समझदारी नही नादानी है दो माह बाद तो ठंड निकल जायेगी पर बच्चा कितनी आसानी से समझा रहा है कथा में बड़ी सरलता से आपने बालमनोविज्ञान को दर्शाया है दिल से बधाईयाआद०राहिला जी ।
Comment by Rahila on November 14, 2015 at 8:16pm
बहुत शुक्रिया आदरणीय आबिद साहब! आपको रचना पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ । सादर ।
Comment by Abid ali mansoori on November 12, 2015 at 8:49pm

kam shabdon mein bahut kuchh keh diya aapne, rachna isi ko kehte hain, hardik vadhayi aadarniya rahila ji!

Comment by Rahila on November 2, 2015 at 8:47pm
बहुत आभार आदरणीय हरिकृष्ण ओझा जी ।
Comment by harikishan ojha on November 2, 2015 at 12:59pm

बहुत बढ़िया रचना हैI आप को बधाई

Comment by Rahila on November 2, 2015 at 12:22pm
बहुत आभार आदरणीय सौरभ पांडे जी! आप सही कह रहे है जिस बात को पढ़ कर हम दुःखी हो जाते है, वो जब आंखों के सामने घटित होता है तो क्या दशा होती है मन आत्मा की ये कहने की जरूरत नहीं । बहुत खुश नसीब है वो लोग जिन्हें खुदा ने खूब नबाजा है ।लेकिन दूसरों की मदद की ताकीद भी की है । बहुत शुक्रिया आपका मेरी रचना की सराहना के लिये । सादर नमन ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 2, 2015 at 12:33am

’दो महीना बाद’, जैसा उत्तर कलेजे को हिला देता है. क्योंकि दो ही महीनों बाद जाड़ा समाप्त हो जाया करता है. 

आशा और हताशा की भावनाओं को साथ-साथ जीती इस लघुकथा के लिए दिल से शुभकामनाएँ आदरणीया राहिलाजी. 

शुभ-शुभ

Comment by Rahila on October 29, 2015 at 10:20am
बहुत शुक्रिया आदरणीया माला जी ! आपको मेरी रचना पसंद आई और साथ ही इतने सुन्दर विचारों का आपने सांझा किया । बहुत आभार ।
Comment by Mala Jha on October 29, 2015 at 8:43am
हृदयस्पर्शी रचना!! सामाजिक वर्गीकरण का उत्कृष्ट व्याख्या !!
जहाँ एक ओर उच्च वर्ग के पास, सभी मौसमों के अनुरूप कपडे अलमारी में ठूँसे रहते हैं वहीँ निम्न वर्ग के पास तन ढंकने के भी कपडे नही।इस खाई को पाटना हम सभी का कर्तव्य है।बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई आ राहिला जी।

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