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तुम्हारें श्री मुख से
दो शब्द
निकले कि
मैंने कैद कर लिया
अपने हृदय उपवन में !!

अब हर रोज
दिल से निकाल
दिमाग तक लाऊँगी
फिर कंठ तक
फिर मुस्कराऊँगी
चेहरे पर
एक अलग सी
चमक बिखर जाएँगी
बार बार यही
दुहराती रहूंगी
क्योकि
अच्छी यादों को
बार-बार खाद-पानी
चाहिए ही होता है!!

और तब जाके
एक दिन
तैर जायेंगी
सरसराहट
बेकाबू हो
उड़ चलेगा
पूरा शरीर ही
हल्का-फुल्का हो
आकाश के उस पार !!

फिर तुम्हारें ही
महज दो बोल
भारी कर जायेंगे
मन को
और तत्क्षण
ला पटकेंगे मुझे
धरती पर !!

क्यों !
होता हैं न ऐसा
कभी कभी !!!

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 515

Comment

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Comment by savitamishra on October 29, 2015 at 8:04pm

आभार आपका आदरणीया | सादर _/\_

Comment by pratibha pande on October 22, 2015 at 7:44pm

अब हर रोज 
दिल से निकाल 
दिमाग तक लाऊँगी 
फिर कंठ तक 
फिर मुस्कराऊँगी .....   कोमल नारी मन  थोड़े में ही खुश होकर उड़नेलगता है ,और फिर धडाम से नीचे भी आ जाता है ,  सुंदर रचना बनी है बधाई आपको आदरणीया सविता मिश्रा  जी 

Comment by savitamishra on October 22, 2015 at 6:36pm

बागी भैया आभार आपका तहेदिल से जो आपको पसंद आई |

Comment by savitamishra on October 22, 2015 at 6:36pm

ऐसा होता हिन् न दी कि कभी दो बोल हमे आसमा में पहुंचा देते और कभी धरा पर गिरा देते| बस मन में आती गयी.... वही लिख गए..|
शुक्रिया दिल से कांता दीदी आपको अच्छी लगी ये आपका बड़प्पन...वर्ना अपन को तो abcd भी न आती
सब सीखा-सीखा हार गए |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 22, 2015 at 8:58am

भावनाओं को सुन्दर अभिव्यक्ति मिली है, अच्छी कविता, बहुत बहुत बधाई आदरणीया सविता जी.

Comment by kanta roy on October 21, 2015 at 11:42pm

बार बार यही
दुहराती रहूंगी
क्योकि
अच्छी यादों को
बार-बार खाद-पानी
चाहिए ही होता है!!----बहुत खूब यादों की बात कही है आपने आदरणीय सविता जी। चाँद अच्छे पल जिंदगी भर के जीने के बहाने हो जाया करते हैं अक्सर। बधाई !

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