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कैश बाॅक्स के नजारे

साफ़ नीला आसमान

सफेद रूई सा हल्का

बिलकुल हल्का ,

हल्का वाला सफेद बादल

कभी बहुत भारी सा हो जाता है

वक्त रेशम सी ,

रेशम सी मुलायम वक्त

फिसलती हुई ,सरकती हुई

रेशमी सा एहसास देती हुई गुजर जाती है

वक्त के वजूद में

जाने क्यों पहिए होते है

जो दिखाई नहीं देते पर ब्रेक नहीं होते है

शायद ब्रेक भी रहें हो कभी लेकिन

आजकल वक्त  नहीं रूकता

यहाँ बाजार में बहुत भीड़ है

यह भीड़ कभी खत्म नहीं होती

यहाँ वक्त का कोई आस्तित्व नहीं है 

रूई के फाये सी हल्की बादलों को

कोई नहीं देखना चाहता

वक्त नहीं है बाजार में किसी को  आसमान देखने की

और चाहत नहीं है

उनको चाहत की क्या जरूरत

नीला आसमान तो

उनके दायरे में ही सिमटा हुआ जो होता है

वो सिर्फ कैश बाॅक्स की तरफ देखते है

नीला आसमान नहीं देखते

रूई के फाये सी हल्की बादलों को नहीं देखते

सिर्फ कैश बाक्स की तरफ देखते है

कैश बाॅक्स में उन्होंने

नीले आसमान को बंद करके रखा है

जब मर्ज़ी निकाल लेते है

जब मर्ज़ी देख लेते है ।

क्या जरूरत उन्हें बसंत की

क्या जरूरत उन्हें सावन और सुगंध की  

 ठहर कर क्यों देखे भला 

वो तो सारे मौसमों को

अपने कैश बाॅक्स में बंद रखते है

जब फुरसत मिलती है काम से

जब मन करता है आराम से

कैश बाॅक्स में से सारे नजारे निकाल लेते है

और जी लेते है जब तब अपने मनचाहे मौसम को

मौलिक  और अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by kanta roy on December 4, 2015 at 11:14pm

मेरे प्रयास को संबल देने के लिए आभार आपको आदरणीय मिथिलेश जी। 

Comment by kanta roy on December 4, 2015 at 11:13pm

आभार आदरणीय शहज़ाद जी रचना पसंदगी हेतु। 

Comment by kanta roy on December 4, 2015 at 11:12pm

मार्गदर्शनयुक्त सराहना पाकर अभिभूत हुई आदरणीय शिज्जु शकूर जी।  आभार आपका।  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 1, 2015 at 10:01pm

आदरणीया कांता जी बढ़िया प्रयास हुआ है भावाभिव्यक्ति बढ़िया है. हार्दिक बधाई.

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 1, 2015 at 8:46pm
आपा-धापी, भागम-भाग की अर्थ-व्यस्तता की जीवन-शैली में कैश बोक्स संग संतुष्ट मनुष्य प्रकृति और अन्य सहज सुखों से किस तरह वंचित रह जाता है, इन सब यथार्थ को शब्द-चित्र से बखूबी व्यक्त करने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीया कान्ता राय जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 1, 2015 at 7:56pm
आदरणीया कांताजी अतुकांत रचनाओ मे रवानी को आखिर तक बनाये रखना एक चुनौती होती है और भावों एवं शब्दों का अकारण दोहराव भी कभी कभी रचना को कमज़ोर कर देते है। आपकी रचना के भाव अच्छे हैं बधाई आपको। हाँ लेकिन अभी भी गुंजाइश है

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