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अंधेरों का वजूद/ लघुकथा

सहसा अंतरव्यथा से जूझती हुई सिसकियों ने दम तोड़ ,घुटने टेक दिये । फैसला कायम हो चुका था । काले कोट वाले वजीर ने गुनाहों के कीचड़ में सने हुए बादशाह को , सूर्य  सा दैदीप्यमान बना दिया था। गुनाह बेदाग़ बरी हो अट्टाहास करता हुआ बाहर की तरफ एक और  बाजी खेलने को विदा हुआ । इधर काले कोट वाला वजीर अपने जेब की गहराई नाप रहा था। 

और उधर अंधी के आँखों पर चढी काली पट्टी ने अंधेरों का वजूद अंततः कायम रखा. तराजू फिर जरा सा डोल कर रह गया ।


मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by kanta roy on December 4, 2015 at 11:10pm

कथा पसंदगी हेतु  आभार आपका  आदरणीय आबिद अली   जी। 

Comment by kanta roy on December 4, 2015 at 11:09pm

कथा पर आपकी मौजूदगी मेरे मनोबल को बढ़ाती  हुई , आभार आपका हृदयतल से आदरणीया प्रतिभा जी। 

Comment by kanta roy on December 4, 2015 at 11:07pm

आभार आपका  तहेदिल आदरणीय जानकी जी  पसंदगी के लिए । 

Comment by kanta roy on December 4, 2015 at 11:06pm

कथा के मर्म को समझने के लिये  आभार आपको आदरणीय तेजवीर  जी। 

Comment by kanta roy on December 4, 2015 at 11:05pm

कथा के मर्म को समझने के लिये  आभार आपको आदरणीया राहिला जी। 

Comment by Abid ali mansoori on November 4, 2015 at 8:07pm

एक सार्थक लघु कथा के लिए हर्दिक वधाई आदरणीया कांता जी!

Comment by pratibha pande on November 4, 2015 at 7:26pm

 'तराज़ू फिर ज़रा सा डोल के  रह गया 'कितना कुछ बोल गई ये पंक्ति ,बहुत ही सशक्त और सटीक  कथा बुनी है आपने , ह्रदय से बधाई लें आप इस प्रस्तुति के लिए आदरणीया कांता जी 

Comment by Janki wahie on November 4, 2015 at 5:26pm
बेहतरीन लघुकथा। सच्चाई को दिखती ।बधाई सखी।
Comment by TEJ VEER SINGH on November 4, 2015 at 5:08pm

हार्दिक बधाई आदरणीय कान्ता जी!बहुत ही मार्मिक और अच्छी लघुकथा!

Comment by Rahila on November 4, 2015 at 3:15pm
ये तो हर रोज किसी ना किसी अदालत का नजारा है । इंसान इंसाफ करने लगे अगर तो कलयुग कहां रह जायेगा ।उस पर लचड़ कानून व्यवस्था ने कसर बाकी नही रखी । बहुत ही बेहतरीन रचना आदरणीया कांता दी ।बहुत बधाई आपको इस उम्दा लेखन के लिये ।

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