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मीर के जैसी गज़लें कहना सबके बस की बात नही।

हाले गमे तन्हाई लिखना सबके बस की बात नही।
दीवानो सी बातें करना सबके बस की बात नही।

दोस्ती यारी सब करते हैं आज भी इन्सां दुनिया में
कृष्ण सुदामा जैसी निभाना सबके बस की बात नही।

हँसते बच्चों को तो रुलाना होता हैं आसान यहाँ
रोते को है आज हँसाना सबके बस की बात नही।

हमने लिखा है नाम तुम्हारा दिल के लहू से कागज़ पर
कैसे कहें हम इसको मिटाना सबके बस की बात नही।

दो मिसरों को जोड़ के हमने गज़लें तो कह डाली हैं
मीर के जैसी गज़लें कहना सबके बस की बात नही।

प्यारी प्यारी बातें करना होता है आसाँ "रिज़वान"
तकलीफों में हाथ बढ़ाना सबके बस की बात नही।

* रिज़वान खैराबादी *

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on December 28, 2015 at 1:14pm
.
Comment by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on December 26, 2015 at 1:30am
शुक्रिया हौसला अफज़ाई के लिये जनाब शिज्जू जी!
Comment by Ravi Shukla on November 2, 2015 at 3:23pm

आदरणीय रिजवान जी बहुत बढि़या ग़ज़ल कही है आपने । निवेदन है कि ग़ज़ल पोस्‍ट करने से पहले उसका अरकान या वज्न लिख दिया करें जिससे सभी पाठकों को आसानी हो ।

दो मिसरों को जोड़ के हमने गज़लें तो कह डाली हैं
मीर के जैसी गज़लें कहना सबके बस की बात नही।  वाकई दो मिसरों में अरकान के अनुसार लफ्ज फिट कर देना ही शेर नहीं होता बहुत बहुत बधाई आपको इस ग़ज़ल के लिये ।

Comment by amod shrivastav (bindouri) on November 2, 2015 at 1:02pm
दर्द छिपा कर हँसते रहना सब के बस की बात नही ......
Comment by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on November 1, 2015 at 8:13pm
शुक्रिया आo शिज्जु जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 1, 2015 at 7:44pm
बहुत बढ़िया रिज़वान जी बधाइयाँ आपको

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