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मोहब्बत की जो दिल में बहार रखते हैं

सुकून रखते है हर पल क़रार रखते हैं
मोहब्बत की जो दिल में बहार रखते हैं।।

वो आयेगा तो बहारें भी साथ लायेगा
उसी के आने का हम इन्तज़ार रखते हैं।।

कहाँ-कहाँ से मिले ज़िन्दगी की राहों में
हम अपने ज़ख्मों का खुद ही शुमार रखते हैं।।

कफ़न भी बांध के हमराह अपने सारे जवाँ
जो सरहदों पे हैं आँखें भी चार रखते हैं।।

यही है फितरते इन्सां तो इसको क्या कहिये
सब अपने-अपने लहू से ही प्यार रखते हैं।।

तालुक़ात कहाँ तक निभायें हम उनसे
जो अपने हो के हमें शर्मशार रखते हैं।।

पढ़ो तो गौर से रोशन हो आईना दिल का
वरक़ हयात के हम शानदार रखते हैं।

लुटा दी उनके लिए ज़िन्दगी की सारी ख़ुशी
वो है कि ग़ैरों में मेरा शुमार रखते हैं।।

मिला है दिल कुछ ऐसा की हर घड़ी 'रिज़वान'
हम अपने दोस्तों पे जाँ निसार रखते हैं।।

 "मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on February 3, 2016 at 10:32pm
शुक्रिया आ० लक्ष्मन जी
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 3, 2016 at 12:18am

इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई l

Comment by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on February 2, 2016 at 10:58am
हौसला अफज़ाई के लिये शुक्रिया आदरणीय!!
Comment by Hari Prakash Dubey on February 2, 2016 at 1:32am

आदरणीय रिजवान साहब बहुत सुन्दर रचना .. लुटा दी उनके लिए ज़िन्दगी की सारी ख़ुशी

वो है कि ग़ैरों में मेरा शुमार रखते हैं..वाह ! हार्दिक बधाई आपको ! सादर 

Comment by Samar kabeer on February 1, 2016 at 11:14pm
जनाब रिज़वान जी,आदाब,अच्छी ग़ज़ल से नवाज़ा है आपने मंच को,मुबारकबाद क़ुबूल करें,ग़ज़ल के अरकान नहीं लिखे हैं आपने ?
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 1, 2016 at 9:41pm
बहुत ख़ूब।
Comment by Ravi Shukla on February 1, 2016 at 1:18pm

आदरणीय रिजवान जी  बढि़या ग़ज़ल कही ह आपने बधाई स्‍वीकार करें । ग़ज़ल से पहले उसका अरकान या बह्र लिख देने का निवेदन है

समझने में आसानी रहती है ।

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