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किसी मायने में भी कमतर नही हूँ
मगर पूजा जाऊं वो पत्थर नहीं हूँ
इसी को तो कहते है किस्मत भी शायद
तेरा हो के तेरा मुकद्दर नहीं हूँ
मेरी साइतों में ‘‘ठहरना’’ नही है..
मैं दरिया हूँ प्यासा ; समन्दर नहीं हूँ
पलटकर जरा देख इक़ बार फिर से
यही सोच लूँ गुजरा मंजर नहीं हूँ.
तेरे कू पे बैठा अगरचे हूँ लेकिन
जो कुछ मांगे मैं वो कलंदर नहीं हूँ
मुझे ढूंढ़ता तू कहाँ है रे बन्दे?
मैं बाहर नहीं हूँ कि अन्दर नहीं हूँ?
मैलिक व् अप्रकाशित
©जान गोरखपुरी
Comment
आपकी गज़ल अच्छी लगी, हार्दिक बधाई, आदरणीय जान गोरखपुरी जी।
आदरणीय कृष्ण भाई जी , शानदार ग़ज़ल हुई है. शेर दर शेर दाद ओ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं.
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