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१२२  १२२ १२२  १२२

किसी मायने में भी कमतर नही हूँ                         

मगर पूजा जाऊं वो पत्थर नहीं हूँ

 

इसी को तो कहते है किस्मत भी शायद

तेरा हो के तेरा मुकद्दर नहीं हूँ

 

मेरी साइतों में ‘‘ठहरना’’ नही है..

मैं दरिया हूँ प्यासा ; समन्दर नहीं हूँ

 

पलटकर जरा देख इक़ बार फिर से

यही सोच लूँ गुजरा मंजर नहीं हूँ.

 

तेरे कू पे बैठा अगरचे हूँ लेकिन

जो कुछ मांगे मैं वो कलंदर नहीं हूँ

 

मुझे ढूंढ़ता तू कहाँ है रे बन्दे?

मैं बाहर नहीं हूँ कि अन्दर नहीं हूँ?

मैलिक व् अप्रकाशित 

©जान गोरखपुरी

Views: 526

Comment

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on December 16, 2015 at 6:56pm
सादर आभार आ.विजय निकोर सर,नवाजिश है आपकी।
Comment by vijay nikore on December 16, 2015 at 1:34pm

आपकी गज़ल अच्छी लगी, हार्दिक बधाई, आदरणीय जान गोरखपुरी जी।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on December 15, 2015 at 2:00pm
बेहद शुक्रिया आ.मिथिलेश सर नवाजिश है आपकी।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on December 15, 2015 at 1:59pm
ज़र्रानवाज़ी के लिए बेहद शुक्रिया आ.समर सर.जी सर कोशिश करूँगा आगे से और सक्रिय रहूँ ओबीओ पर।सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 15, 2015 at 12:35am

आदरणीय कृष्ण भाई जी , शानदार ग़ज़ल हुई है. शेर दर शेर दाद ओ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं. 

Comment by Samar kabeer on December 14, 2015 at 10:36pm
जनाब "जान" गोरखपुरी जी,आदाब,बहुत दिनों बाद आपको ओबीओ पर देखकर ख़ुशी हुई,बहुत ही अच्छी और शानदार ग़ज़ल से नवाज़ा है आपने मंच को,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

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