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मय वो दौलत है जो जन्नत से यहाँ तक पहुँचे

बह्र:-2122-1122-1122-22

उसने ख़त लिख्खे रूमानी, वो कहाँ तक पहुँचे।।
मेरा दावा है रकीबों की ,जुबाँ तक पहुँचे।।

आह मत ले तु गरीबों की ,अमीराँ हो कर।
छोड़ दौलत को दुआयें ही, वहाँ तक पहुँचे।।

दौरे हाजिर में मुकाबिल है कहीं भी बेटी।
मेरी ख्वाहिस है बुलंदी के मकाँ तक पहुँचे।।

खुद खुदा ने ही खुदाई की खिलाफत करदी।
बे समय पानी ये पत्थर भी किसां तक पहुचे।।

नाम लेना भी गुनाहों में गिना क्यों तुमने।
मय वो दौलत है जो जन्नत से यहाँ तक पहुँचे।।

आमोद बिन्दौरी

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Comment

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Comment by vijay nikore on April 6, 2016 at 1:02pm

अच्छी गज़ल के लिए बधाई।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 5, 2016 at 10:53am

आ० भाई आमोद जी इस सूंदर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 4, 2016 at 10:22pm

आह मत ले तु गरीबों की ,अमीराँ हो कर।
छोड़ दौलत को दुआयें ही, वहाँ तक पहुँचे।।---बहुत  खूब 

दौरे हाजिर में मुकाबिल है कहीं भी बेटी।
मेरी ख्वाहिस है बुलंदी के मकाँ तक पहुँचे।।---वाह्ह्ह  शानदार शेर 

बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है आमोद जी 

बे समय पानी ये पत्थर भी किसां तक पहुचे।।----इस मिसरे में पत्थर शायद आप ओलों के लिए लिख रहे हैं क्या मैंने सही समझा  किसान को किसां लिखना क्या ठीक होगा ?

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 4, 2016 at 4:10pm

sunder prastuti

Comment by amod shrivastav (bindouri) on April 4, 2016 at 12:51pm
आप सभी का स्नेह ही है राहिला दी जो मार्गदर्शन देता है। वर्ना मैं कुछ नही ......इस अनन्त महा सागर में.....आप का स्नेह पाकर बहुत ख़ुशी हुई आप का आभार दी
Comment by Rahila on April 3, 2016 at 6:58pm
आप बहुत ही शानदार ग़ज़ल लिखते है आद.आमोद जी! मुझे इस विधा की कोई जानकारी नहीं लेकिन हर शेर का मफहूम इतना गजब का है कि तारीफ किये बगैर ना रह सकी । बहुत बधाई ।सादर

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