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जेठ तपता आषाढ तपता,
सावन भी तपता जा रहा,
जेठ की लू सावन में चलें,
समय बदलता जा रहा।

सावन में जब वर्षा होती,
कोयल कू-कू गाती थी,
मेंढक टर्र-टर्र करते थे,
बहारें राग सुनाती थी।

शीतल फुहारें झर-झर कर,
माथे से टकराती थी,
नई स्फूर्ति तन-मन में,
एकाएक भर जाती थी।

इंद्रधनुष के सात रंग,
जब याद मुझे वो आते हैं,
तीजों के त्योहार को
ताजा तभी कर जाते हैं।

इस सावन को नजर लग गई,
सावन तपता जा रहा,
जेठ की लू सावन में चलें,
समय बदलता जा रहा।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 6, 2016 at 9:23am
आदरणीय रामबली गुप्ता जी हार्दिक धन्यवाद
Comment by रामबली गुप्ता on May 6, 2016 at 4:47am
बहुत ही तर्कसंगत और सुंदर रचना
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 3, 2016 at 5:48pm
श्रद्धेय मिथिलेश वामनकर जी बधाई के लिए हार्दिक धन्यवाद मगर कृपा करके यह बताएं कि कौन सी रचना की बधाई दे रहे हैं।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 3, 2016 at 3:48pm

आदरणीय सुरेश कुमार जी, आपकी किसी दूसरी प्रस्तुति से गुजर रहा हूँ. इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 3, 2016 at 2:19pm
आदरणीय गणेश जी बागी आपकी बधाई स्वीकार करते हैं बहुत बहुत धन्यवाद

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 2, 2016 at 9:04pm

//इस सावन को नजर लग गई,
सावन तपता जा रहा//
किस सावन को नज़र लग गयी भाई ? अभी सावन को आने में ढाई माह शेष है, ऐसी रचनाएँ काल आधारित होती हैं. वैसे रचना अच्छी हुई है, बधाई तो बनता है आदरणीय सुरेश कुमार जी, बहुत बहुत बधाई.

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