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राहें (सुरेश कुमार ' कल्याण ')

कंटीली राहों से
सीखा है जीना मैंने,
रात की गहराईयों से
सीखा है पीना मैंने।
बात करता हूं मैं
गुजरे वक्त की,
पत्थरों के पथ पर
पाया है नगीना मैंने।
पत्थरों से टकराकर
पत्थरों पे सिर झुकाया है मैंने।
अपनी विनम्रता की आंच से
पत्थरों को पिघलाया है मैंने।
वो हीरे मिले हों
या वो लोहा था,
सागर की लहरों के बीच
मोतियों को पाया है मैंने।

मौलिक व अप्रकाशित
सुरेश कुमार ' कल्याण '

Views: 580

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Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 26, 2016 at 12:05pm
आदरणीय बशर भारतीय जी सादर आभार
Comment by बशर भारतीय on May 26, 2016 at 10:43am
अच्छी कविता है सादर बधाई आपको
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 26, 2016 at 9:16am
श्रद्धेय कल्पना भट्ट जी हार्दिक आभार
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 25, 2016 at 9:22pm

बहुत सुंदर रचना | हार्दिक बधाई आदरणीय सुरेश जी | 

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 25, 2016 at 3:37pm
श्रद्धेय समर कबीर साहब हार्दिक आभार आपको हमारी कविता पसंद आई आपका आशीर्वाद बना रहे
Comment by Samar kabeer on May 25, 2016 at 2:52pm
जनाब सुरेश कुमार कल्याण जी आदाब,बहुत सुंदर लगी आपकी कविता इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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