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अपने मित्रों को समर्पित एक गज़ल

बहर - 222 221 221 22

माला के मोती बिखर जा रहे हैं
सब एक एक कर अपने घर जा रहे हैं

कर आँखें नम छोड़कर यूँ अकेला
देकर इतनें गम किधर जा रहे हैं

ढूंढेगें फ़िर भी नही अब मिलेंगे
हमसा कोई भी जिधर जा रहे हैं

देखो पूरी हो गयी है पढ़ाई
ले बिस्तर वापस शहर जा रहे हैं

भगवन मेरे यार रखना सलामत
साथी मेरे जिस डगर जा रहे हैं

.
मौलिक व अप्रकाशित
(बी.टेक पूरा होने पर अपने मित्रों के जाने पर लिखी गज़ल )

Views: 631

Comment

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Comment by maharshi tripathi on June 5, 2016 at 8:22pm
आ.समर सर,राहिला जी,पवन जी,रचना पर अपनी प्रतिक्रिया देने हेतु आभार !!!
आ.समर सर मैं अभी गज़ल सीख रहा हूँ कृपया अधिक से अधिक ज्ञान दे,अगर आप यूँ ही साथ रहे तो यकीनन मैं और अच्छी गज़ल लिख सकूंगा !!!
Comment by Rahila on June 4, 2016 at 11:14pm
बहुत बढ़िया प्रयास आदरणीय त्रिपाठी जी! हार्दिक बधाई । सादर
Comment by Samar kabeer on June 4, 2016 at 6:34pm
जनाब महर्षि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल कुछ और समय चाहती है, इस प्रयास के लिये बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Pawan Kumar on June 4, 2016 at 3:31pm

मित्रों को समर्पित सुन्दर रचना
हार्दिक बधाई

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