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शाइरी माँगती है ख़ून-ए-जिगर (ग़ज़ल)

2122 1212 22

आसमाँ हम भी छू ही लेते,मगर
काट डाले गए हमारे पर

हमको काँटों की राह प्यारी है
आप ही कीजे रास्तों पे सफ़र

अपनी आँखों में जुगनू बसते हैं
हम पे होगा न तीरगी का असर

हम तो रहते हैं आप के दिल में
खुद का अपना नहीं है कोई घर

इस क़दर खो गया है होश-ओ-हवास
आजकल है न हमको अपनी ख़बर

मर्ज़ पहुँचा है उस मुक़ाम पे अब
हो गया खुद बिमार चाराग़र

नक़्श उसका बसा लिया दिल में
कौन मंदिर को जाए शाम-ओ-सहर

इतना आसाँ नहीं ग़ज़ल कहना,
शाइरी माँगती है ख़ून-ए-जिगर
=========================

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 766

Comment

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Comment by जयनित कुमार मेहता on June 9, 2016 at 10:03pm
आदरणीय सौरभ जी, आपके मार्गदर्शन से बहुत लाभ पहुँचा है मेरी शाइरी को।

आपकी उपस्थिति व अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए पुनः हृदय तल से आभारी हूँ।
सादर।।
Comment by जयनित कुमार मेहता on June 9, 2016 at 10:00pm
आदरणीय डॉ सूर्या बाली जी,
बहुत बहुत धन्यवाद आपको।
सादर।
Comment by जयनित कुमार मेहता on June 9, 2016 at 9:59pm
आदरणीय रवि शुक्ला जी, सर्वप्रथम हार्दिक धन्यवाद स्वीकार करें।

फेलुन से समाप्त होने वाली बहर में 22 को 112 करने की छूट का उपयोग मैंने मतले में किया है। क्या मैंने ठीक नहीं किया है?
Comment by जयनित कुमार मेहता on June 9, 2016 at 9:53pm
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी, ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति व सराहना के लिए हार्दिक आभारी हूँ।
Comment by जयनित कुमार मेहता on June 9, 2016 at 9:50pm
आदरणीय शेख़ साहब, बहुत बहुत शुक्रगुज़ार हूँ आपका।
सादर।
Comment by जयनित कुमार मेहता on June 9, 2016 at 9:49pm
आदरणीय सुशील सरना जी,
ग़ज़ल पर आपकी सरहनात्मक प्रतिक्रिया से हर्षित हूँ।
हार्दिक धन्यवाद आपको।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 9, 2016 at 1:31pm

हाल में ही, इसी मंच पर कहीं टिप्पणियों के माध्यम से हो रही बातचीत के दौरान यह सुनने और जानने को मिला कि शेर उम्दा तभी हो जाते हैं जब उनका काफ़िया सर चढ़ कर न बोले, अर्थात, शेरों में काफ़िये पानी-चीनी से घुले-मिले हों. अन्यथा शेर मात्र काफ़िया केलिए कहा हुआ प्रतीत होता है और वहीं शेर हार जाता है. 

बाकी, ग़ज़ल पर आपका अभ्यास हम सभी देख रहे हैं. सतत प्रयास बना रहे. 

शुभेच्छाएँ

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on June 9, 2016 at 12:29pm

अच्छा है 

Comment by Ravi Shukla on June 8, 2016 at 3:31pm

आदरणीय जयनित जी बढि़या ग़ज़ल कही है आपने बधाई कुबूल करें  

मतले के उला को कुछ और समय दे सकते हैै अभी लय में थोड्री गुजांइश है 

अपनी आँखों में जुगनू बसते हैं
हम पे होगा न तीरगी का असर  बहुत अच्‍छा शेर कहा है 

अखिरी शेर ने गालिब की याद दिला दी 

ऐसा आसां नहीं लहू रोना 

दिल में ताकत जिगर में हाल कहां    पुन: बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 8, 2016 at 12:16pm

आदरणीय जयनित भाई , अच्छी ग़ज़ल के लिये बहुत बधाई आपको ।

कृपया ध्यान दे...

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