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चारो तरफ से पानी..पानी..पानी की आवाज सुनाई दे रही है | जिधर देखो उधर पानी के लिए लम्बी कतारें व पानी के लिए जूझते लोग, पानी ढोते टैंकर से ले कर ट्रेन तक दिखाई दे रहे हैं | हैण्डपम्प, कुँए सूख गए हैं और तालाब अब रहे नहीं, उस पर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए गए हैं | पानी के लिए चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है | देश का रीढ़ किसान आस भरी नजरों से आसमान की ओर देख रहा है | प्यास से घरती का कलेजा फट रहा है | विकाश के नाम पर वन प्रदेश खत्म होते जा रहे हैं, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई हो रही है क्यों की हम विकाश कर रहे हैं ! हरे-भरे जंगलों, वृक्षों,तालाबों और बावड़ियों को खत्म कर हम रंग-बिरंगे, चमकीले कंक्रीट के जंगल खड़े करते जा रहे हैं क्यों कि हम विकाश कर रहे हैं ! अपने घरों से ले कर शहरों और इंडस्ट्रियों की सारी गंदगी को हमने सीधे नदियों में डाल कर उनका आस्तित्व ही खतरे में डाल दिया है क्यों कि हम विकाश कर रहे हैं !
सब से ज्यादा प्रकृति के साथ छेड़छाड़ हम मनुष्यों ने ही किया हैं बाकी के जीव-जंतु तो प्रकृति पर ही निर्भर रहते हैं | हमारा जीवन भी प्रकृति पर ही निर्भर है ये बात हम भूल गए हैं और प्रकृति का जितना दोहन हम कर सकते थे उससे कहीं ज्यादा हम कर रहे हैं जिसका नतीजा जल संकट के रूप में हमारे सामने हैं |
जिसे देखो वही केन्द्र सरकार की ओर मुँह किये सूखे या जल संकट से निपटने के लिए मुआवजे की मांग करता दिखाई दे रहा हैं | क्या पैसे (मुआवजे) से पानी की किल्लत दूर की जा सकती हैं और अगर की भी जा सकती है तो कब तक ? तभी तक ना जब तक कहीं भी जल की एक बूँद बची है | इसके बाद क्या होगा ? कहाँ से आएगा जल ? क्या ये सारी जिम्मेदारी सरकार की हैं ? क्या प्रकृति के संसाधनों का उपयोग केवल सरकारें ही करती हैं ? हम नहीं करते ? तो क्या हमारा भी दायित्व  नहीं बनता कि जल संकट को हम गंभीरता से लें ? पानी देने या पानी की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी सरकार की और सुविधाएँ भोगें हम !
हम जल की तलाश में मंगल तक पहुँच गए पर अपनी धरती के जल को संरक्षित नहीं कर पा रहे | विकाश के नाम पर जरूरत से ज्यादा भूगर्भीय जल का दोहन करना, हमारी जीवनदायिनी नदियों को दूषित करते जानाहमारी प्रवृत्ति बन गयी है | प्रकृति की संतान हो कर भी हमने उसके साथ कितने अन्याय किये हैं तो प्रकृति हमें वरदान तो नहीं दे सकती ना ! प्रकृति के इस बदलते स्वरूप के लिए जिम्मेदार हम भी हैं | हम अपने-अपने निजी स्वार्थ हेतु प्रकृति को पूरी तरह से अनदेखा कर देते हैं |
 हमारे देश में हर वर्ष लगभग तीन से चार अरब लीटर पानी बरसता है पर वह ज्यादा से ज्यादा बह जाता है | हम बहुत ही कम मात्र में उसे सहेज पाते हैं | पहले वन प्रदेश, कुंए, तालाब, बावड़ी आदि इसे संरक्षित कर लिया करते थे पर अब कहीं-कहीं ही इनका नामोनिशान नाम मात्र को ही बचा है | देश-प्रदेश की सरकारें, स्थानीय निकायों और पंचायतों तक ने पानी की सुरक्षा के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई है | सुविधाएँ और ठाट-बाट सबको चाहिए पर पानी की सुरक्षा नहीं |
एक बात और जो मेरी छोटी सी बुद्धि में आ रही है | पानी सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है | प्रकृति अपने संसाधन हम सब पर एक समान लुटाती है तो प्रकृति की तरफ जिम्मेदारी भी हम सब की बराबर है | घर-घर, गाँव-गाँव, शहर-शहर हर जगह बढ़ता लगातार जल संकट से यह साफ़ जाहिर हो गया है कि जल से जुड़ी समस्याएँ हम सब की हैं सिर्फ सरकारों की नहीं | हमें अपने आज के लिए, हमें अपने कल के लिए, जल का प्रबंध करना होगा क्यों कि जल है तभी तो कल है |
आज जल कि ये हालत है तो आने वाले वर्षों में क्या हालात होंगे ? अनुमान कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं | इस लिए जल संरक्षण के उपाय और जल के सीमित उपयोग का संकल्प हम सब को मिल कर करना होगा चाहे सरकार हो, सामाजिक संस्थान हो या समाज के लोग | यह हम सभी की जिम्मेदारी है | अगर हम आज भी नहीं चेते तो कल कुछ भी नहीं बचेगा |

मीना पाठक
कानपुर

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Comment by Meena Pathak on June 29, 2016 at 9:14pm

इतना मान देने के लिए सादर आभार आ० सौरभ सर | क्या कहूँ कोई शब्द नहीं मिल रहा ..पुन: तहेदिल से आभार स्वीकारें ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 13, 2016 at 3:05pm

इतने अच्छे लेख की लेखिका, इतनी सार्थक चर्चा की सूत्रधार ! आप अपनी बुद्धि को ’अल्प बुद्धि’ क्यों लिख गयी, आदरणीया ? ऐसी लेखकीय आदत उस काल की याद दिलाती है, जब हम ग़ुलाम थे और आकाओं के सामने अपनी बात रखते थे - Most humbly, respectfully, I beg to state वाले इश्टाइल में !

ऐसा न लिखा करें, आदरणीया मीना जी. आप समृद्ध मनस की सार्थक अभ्यासकर्म को प्रवृत्त एक सुगढ़ लेखिका हैं. 

सादर

Comment by Meena Pathak on June 13, 2016 at 2:03pm

आदरणीय सौरभ सर ..मैंने अपनी अल्प बुद्धि से यही कहने का प्रयास किया है कि सरकार को कुछ कड़े कदम उठाने होंगे और हम सब को अपने अपने स्तर पर भी प्रयास करना होगा तभी इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है | अगर सभी मिल कर प्रयास करें तो चेन्नै की तरह हमारे शहरों में भी पानी की कमी से निजात पाया जा सकता है |
लेख को समय देने और त्रुटियों की तरफ इंगित करने के लिए सादर आभार सर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 12, 2016 at 2:25pm

मैं तब चन्नै में हुआ करता था. पूरा तमिळनाडु, विशेषकर चेन्नै राजधानी होने के कारण, घोर जल-संकट से गुजरा करता. हर साल गर्मी का मौसम भयानक दिन लेकर आता. मुहल्लों में पानी के टैकर आ जाते तो ऑफ़िस केलिए निकलते लोग रुक कर पहले सपरिवार ’पॉट्स’ में पानी बटोरते. हर मुहल्ले छोड़िये, हर गली का टैंकर हुआ करता था.

फिर २००५ में सरकारिया घोषणा हुई कि हर घर को पानी-संरक्षण या ’वाटर-हार्वेस्टिङ’ का इंतज़ाम करना ही करना होगा. यानी अनिवार्य तौर पर. अन्यथा मुआयना करने पर लापरवाही बरतने वालों पर भारी दण्ड का प्रावधान था. जो परिवार इस मद में पैसा खर्चने में कमज़ोर थे उनको सरलतम क़िश्तों में सरकारी कर्ज़ मिला था. मात्र नौ महीनों में चेन्नै शहर का हर घर-बिल्डिंग-मकान-संस्थान ’वाटर-हार्वेस्टिङ’ के इंतज़ाम से लैस था. अगले नवम्बर-दिसम्बर की बारिस में (वहाँ नवम्बर-दिसम्बर में बारिश होती है), धरती का वाटर लेवेल पचास से पचपन फीट पर था, जो मात्र एक साल पहले तीन सौ से चार सौ फीट पर हुआ करता था. चैन्नै शहर को २००५ से पानी की कमी फिर कभी नहीं झेलनी पड़ी. कहने का तात्पर्य है कि हम कितने जागरुक हैं ! चेन्नै का ही प्रयास् अपने शहर में हम क्यों नहीं कर सकते ? तालाबों की खुदाई-सफ़ाई का काम होना शुरु हुआ है. लेकिन कितना दिखावा और कितनी हकीकत है इसे तो परिणाम के आने के बाद ही समझा जा सकेगा. 

आजकी सबसे बड़ी समस्या पर कलन चलाने केलिए हार्दिक धन्यवाद मीनाजी. 

एक बात : 

विकाश को विकास लिखा करें.  और, एक-दो जगह टंकण त्रुटियो के प्रति ध्यान दीजिये. 

सादर

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