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अपनी टपरिया, अपनो सिलसिला (लघुकथा)

"अबकी हमयीं करेंगे जो काम, तुम औंरें नीचे ठांड़े रईयो, जैसी कहत जायें, करत जईयो!" यह कहते हुए ज़िद्दी बाबूजी ऊपर चढ़ गए छप्पर सही करने।

"का फ़ायदा ई घास-फूस के छप्पर से, आंधियन में फिर सब बिखर जैहे!" कन्हैया ने व्यंग्य करते हुए कहा।

"बेटा, आंधी-तूफ़ानों से कैसे निपटो जात है, जो हमईं खों मालूम है, तुम औरों ने तो कछु नईं भोगो अभै तक!" बाबूजी ने कन्हैया और उसकी पत्नी के हाथों कुछ बल्लियें (लकड़ियें) और घास-फूस लेते हुए कहा- "झुग्गी झोपड़ियों में ज़िन्दगी ग़ुज़ारवे को लम्बो तज़ुर्बा है मोय, क़ुदरत तो क़ुदरत , इंसानों के थोपे भये आँधी-तूफ़ान झेल लये हमने!"

"तुमने झेल लये, हम न झेल पेहें! बेर-बेर जोड़वे-तोड़वे को जो काम हम न कर पेहें बेर-बेर, के दई हमने!" लल्लन ने नीचे से चिल्लाकर कहा।

दोनों बेटों को समझाते हुए बाबूजी बोले- " जोड़वे-तोड़वे और बनावे-मिटावे को जो सिलसिला हर जगा चलत है , हमरी बस्तियन में, राजनीति में और सरकार में भी! जब नेता और सरकार हमरे संग बदमाशी करत हैं, तो हमखों भी जोई सिलसिला चलन देने हैं, झुग्गियन में ही रहने हैं, ऐन खाओ-पियो, मेहनत करो, पैसा जोड़ो, पैसा! बाक़ी ऊपर वाले की टपरिया सभई में 'बेस्ट'!"

[मौलिक व अप्रकाशित]

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 17, 2016 at 12:11pm

आदरणीय शेख जी ..रचना की भाषा पढ़ कर बुंदेलखंड की याद आने लगी ऐसी ही भाषा बहन बोली जाती है ...रचना पसंद आयी  इस रचना पर मेरी हार्दिक बढ़ाई स्वीकार करें..हाँ ..बेर-बेर जोड़वे-तोड़वे को जो काम हम न कर पेहें बेर-बेर...    बेर बेर का दो बार प्रयोग उलझन में डाल रहा है .. ये प्रयोग सही होगा ,,लेकिन मुझे लगता है यदि एक बार भी इसका उपयोग हो तो भी कोइ फर्क नहीं पड़ेगा .. अन्यथा न लीजियेगा ,...सादर नमन के साथ 

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