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ग़ज़ल -है फर्क बहुत मेरे तेरे गुलज़ारों में -( गिरिराज भंडारी

22   22   22   22   22   2   ( बहरे मीर )
है फर्क बहुत मेरे तेरे गुलज़ारों में

महज़ साम्य है विज्ञापित दीवारों में

 

तुम अच्छाई खोजो इन हत्यारों में

हम भी खुशियाँ खोजेंगे इन हारों में

 

कहीं खून से होली खेली जाती है

कहीं दूध है प्रतिबंधित त्यौहारों में

 

पत्थर होगा वो तुमने जो घर लाया  

मोम कहाँ मिलते हैं इन बाज़ारों में

 

फुट पाथों को तुम भी रौंदोगे इक दिन

हो जाती है यही तेवरी कारों में

 

मेरी नज़रें ठोस ज़मीं में फिरती हैं 

मेरी रातें कटती नहीं सितारों में

 

कितने एसिड हम तक आ के शून्य हुये

अभी असर बाक़ी है हम से क्षारों में

 

अदा समझ लूँ तेरे इनकारों को मैं

तू कमियाँ खोजे मेरे स्वीकारों में

 

सभी अमल में मैं तुमको दिख जाऊँगा

जैसे तुम मिल जाते हो सब नारों में

******************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 30, 2016 at 8:18pm

आदरणीय बृजेश भाई , सराहना के लिये आपका हृदय से आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 30, 2016 at 8:18pm

आदरणीय राजबुन्देली भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 30, 2016 at 8:17pm

आदरनीय आशुतोष भाई , हौसला अफज़ाई का शुक्रिया ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 30, 2016 at 8:15pm

क्या बात है क्या बात है आदरणीय बहुत ही खूबसूरत

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on June 30, 2016 at 4:35pm

आदरणीय गिरिराज भाईसाब,,,, हार्दिक बधाई स्वीकार करें,,,नमन

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 30, 2016 at 2:25pm

आदरणीय गिरिराज भाईसाब ..इस उम्दा प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर प्रणाम के साथ 

कृपया ध्यान दे...

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