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तज़मींन बर तजमींन

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन

"तज़मीन बर तजमीन समर कबीर साहिब बर ग़ज़ल हज़रत सय्यद रफ़ीक़ अहमद "क़मर" उज्जैनी साहिब"



कोई पूछे ज़रा हमसे कि क्या क्या हमने देखा है
सुलगता शह्र औ' बिखरा वो कुनबा हमने देखा है
नया तुम दौर ये देखो पुराना हमने देखा है
"ख़ज़ाँ देखी कभी मौसम सुहाना हमने देखा है
अँधेरा हमने देखा है,उजाला हमने देखा है
फ़सुर्दा गुल कली का मुस्कुराना हमने देखा है"
"ग़मों की रात ख़ुशियों का सवेरा हमने देखा है
हमें देखो कि हर रंग-ए-ज़माना हमने देखा है"

_____
सियासत ने दिये रख हाँथ में दो मुल्क के नक़्शे
उखड़ना था जड़ों से, लोग आख़िरकार थे उजड़े
लहू से जिस्म थे लथपथ कि राहों में भी थे शोले
"वो मंज़र जब कि माँओं से जुदा होने लगे बच्चे
वो दिन भी याद है जब फूल से मुर्झा गये चहरे
लहू से सुर्ख़ थे दरिया,गली,बाज़ार और कूचे"
"हज़ारों आफ़तें टूटीं, हज़ारों हादसे गुज़रे
न पूछो दौर-ए-आज़ादी में क्या क्या हमने देखा है"
_____

बदर होते वतन से अपने सब नामोंनिशाँ देखें
न रुक ए दिल चल अब हम दूर से उठता धुआँ देखें
कहाँ तौफ़ीक़ आँखों में कि ये जलता मकाँ देखें
"बताओ किस तरह बर्बादियों का ये समाँ देखें
कली को फूल को भँवरों को हम मातम कुनाँ देखें
यहाँ क्या देखने को रह गया है,क्या यहाँ देखें"
"अब इन आँखों से क्या वीरानीए दौर-ए-ख़ज़ाँ देखें
जिन आँखों से बहारों का ज़माना हम ने देखा है"
_____
वो हैं जो हुक्मरां उनकी भी फ़ित़्रत हम समझते हैं
यहाँ मुफ़्लिस की है क्या क़द्रो क़ीमत हम समझते हैं
न हैं जाहिल, ये आईन ए जराहत हम समझते हैं
"बजा है दोस्तों इनकी शिकायत हम समझते हैं
हमें मालूम है इसकी हक़ीक़त हम समझते हैं
नहीं समझोगे तुम इनकी मुसीबत हम समझते हैं"
"ग़रीबों को है कयूँ दुनिया से नफ़रत हम समझते हैं
ग़रीबों से सुलूक-ए-अह्ल-ए-दुनिया हम ने देखा है"
_____
स़दा इक दिन जरस की देख आयेगी ही आयेगी
मिटेंगे फ़ासले, पैरों में सरह़द भी न लिपटेगी
दबी ये टीस आख़िर 'नील' इक दिन तय है उभरेगी
"बग़ावत की "समर" हर सम्त से आवाज़ उठ्ठेगी
सदाए-बैकस-ओ-मजबूर ऐसा रंग लाएगी
हक़ीक़त है,ज़माने की रविश कुछ ऐसे बदलेगी"
" "क़मर" इक दिन बुलंदी पस्तियों के पाँव चूमेगी
कि यूँ भी इन्क़िलाब-ए-नज़्म-ए- दुनिया हम ने देखा है"

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on July 27, 2016 at 6:44pm
जी,फ़िलहाल नेटवर्क समस्या से जूझ रहा हूँ,उलझन दूर होते ही ज़रूर पढूंगा ।
Comment by shree suneel on July 26, 2016 at 2:38am
आदरणीय समर कबीर सर जी, हौसला अफ्जाई के लिए शुक्रिया!
मेरे दोनों तज़मींन इसी ब्लॉग पर उपलब्ध हैं. यहीं से previous post पर click कर दूसरे और ऐसे हीं पहले तजमींन तक पहुँचा जा सकता है.
आशा है आपका मार्गदर्शन प्राप्त होता रहेगा. सादर.
Comment by Samar kabeer on July 25, 2016 at 11:14pm
आपका यह अमल सराहनीय है,आपकी पिछली तज़मीन मैं कहाँ और कैसे पढ़ सकता हूँ, कृपया मुझे बताऐं ।
Comment by shree suneel on July 24, 2016 at 7:28pm
आदरणीय समर कबीर सर जी, इस तजमींन बर तजमींन पर आपकी उत्साहित करती प्रतिक्रिया से प्रफुल्लित हूँ. अापको संतुष्ट पा कर मेरा हौसला बढ़ा है. इसके लिए बहुत बहुत शुक्रिया.
आदरणीय, मैं भी चाहता हूँ कि ये विधा पुनः जीवित हो. इसलिए अाजकल तज़मींन पर कुछ ज़्यादा ही काम कर रहा हूं. इसके पहले भी दो तज़मींन मंच पर दे चुका हूँ लेकिन शायद पिछले माह की व्यस्तता के चलते आप देख न सके. आगे भी मेरी कोशिश होगी आदरणीय कि तज़मींन और तज़मींन बर तज़मींन पेश करूँ. उम्मीद है सर, आपका तज़मींन हम सब को पढ़ने को मिलता रहेगा.

जिस मिसरे पे आपने इस्लाह दिया उसे स्वीकार करते हुए उसमें अभी तब्दीली करता हूँ आदरणीय. वाकई ये सटीक है.

प्रस्तुति की सराहना व उत्साहवर्धन के लिए पुनः धन्यवाद आदरणीय. सादर.
Comment by shree suneel on July 24, 2016 at 6:44pm
प्रस्तुति की सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय अशोक रक्ताले सर जी. सादर
Comment by shree suneel on July 24, 2016 at 6:42pm
रचना तक आने, इसकी सराहना व उत्साहवर्धन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय गिरिराज सर जी. सादर.
Comment by Samar kabeer on July 21, 2016 at 3:04pm
जनाब श्री सुनील जी आदाब,भाई जी ख़ुश कर दिया आपने,इस विधा को पुनः जीवित करने में आपका योगदान भुलाया नहीं जायेगा ।
बहुत ही फनकारी से मिसरे चस्पाँ किये हैं आपने,इस खूबसूरत तज़मीन बर तज़मीन के लिये ढेरों दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
"न रुक ऐ दिल चलो अब दूर से उठता धुआँ देखे"
ये मिसरा कुछ कमज़ोर नज़र आया,'ऐ दिल चलो'में दिल के साथ चलो मुनासिब नहीं लग रहा यहां'चल'कहना था ये मिसरा इस तरह दुरुस्त हो सकता है:-
"न रुक ए दिल चल अब हम दूर से उठता धुआँ देखें"
इस शानदार प्रस्तुति पर पुनः बधाई आपको,सलामत रहिये ।
Comment by Ashok Kumar Raktale on July 20, 2016 at 1:22pm

आदरणीय श्री सुनील जी सादर, सुंदर तज़मीन बर तज़मीन. बहुत-बहुत बधाई  स्वीकारें. सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 19, 2016 at 6:10pm

आदरणीय श्री सुनील भाई , बहुत बेहतरीन तज़मीन की है आपने , क्या बात है ! मुबारकबद कुबूल करे ।

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