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दो ही किरदार थे कहानी में (ग़ज़ल)

2122 1212 22

आग शायद लगी है पानी में।
शोर है खूब, राजधानी में।

जाने हर बार क्यों निकलता है,
फ़र्क़,उसके मिरे मआनी में।

बोलिये! किसको होती दिलचस्पी,
दो ही किरदार थे कहानी में।

आदमी का नसीब है,बहना..
वक्त के मौजों की रवानी में।

उम्र सारी बटोरने में गई,
ख़्वाब टूटे थे कुछ,जवानी में।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 15, 2016 at 4:16pm
वाह्ह्ह् जयनित भाई,उम्दा ग़ज़ल कहने के लिए हार्दिक बधाई।
Comment by Samar kabeer on August 14, 2016 at 3:09pm
जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब,ग़ज़ल उम्दा हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
"आदमी का नसीब है बहना
वक़्त के मौजों की रवानी में"
इस शेर में'मौज'स्त्रीलिंग होने की वजह से शैर का मफ़हूम पूरी तरह वाज़ेह नहीं हो रहा है, देखिएगा ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 14, 2016 at 1:36pm

भाई जयनित जी ..आपकी ये ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद आयी ,,हर शेर उम्दा 

आदमी का नसीब है,बहना..
वक्त के मौजों की रवानी में।

उम्र सारी बटोरने में गई,
ख़्वाब टूटे थे कुछ,जवानी में इन दो शेरो के लिए बिशेश रूप से बधाई स्वीकार करें  सादर 

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