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हमेशा से ये दिल दरिया रहा है (ग़ज़ल)

1222 1222 122
कभी सूखा, कभी बहता रहा है।
हमेशा से ये दिल दरिया रहा है।

जो मेरा अक्स दिखलाता रहा है।
वो आईना ख़ुदी धुंधला रहा है।

ग़ज़ब ये रिश्ता-ए-दिल भी है कैसा,
हमेशा, जुड़ के भी टूटा रहा है।

वो दिल के पास आ पहुँचा है लेकिन,
नज़र से दूर होता जा रहा है।

चुराए हैं मेरी पलकों से उसने,
जो बादल आसमां बरसा रहा है।

ज़माने को भला कैसे बताऊँ
कि तुमसे मेरा क्या नाता रहा है।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by गिरिराज भंडारी on August 11, 2016 at 12:27pm

आदरणीय जयनित भाई , खूब सूरत गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाई ।

दो बातें कहना चाहता हूँ --

1- ख़ुदी का अर्थ -   अहंकार , गर्व , अभिमान , घमन्ड होता है   -- आप खुद  ही को  खुदी कह रहे हैं , अतः बात निरर्थक  हो गई है ।

2- इजाफत मे   ए  की मात्रा  2 नही ली जा सकती  मेरे खयाल से , आप  किसी जानकार से पूछ लीजियेगा । अगर ये सही है तो मिसरा बेबहर हो गया है ।

कृपया ध्यान दे...

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