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ताटंक छ्न्द

पास खड़ी है सजधज कर वह,दुल्हन सबसे प्यारी है
सबको वही पसन्द बहुत है,देखो सबसे न्यारी है
वरण किया जो लेकर आए,उसको वे मतवाले थे
आजादी की दुल्हन खातिर,खुद मिट जाने वाले थे।

देकर अपनी आहुति जो भी,आजादी को लाए थे
राग रंग और मौज मस्ती,क्या उन सबको भाए थे
कुछ तो तोड़ गये थे बेड़ी, जो गैरों ने डाली थी
अबतक भी है घोर गुलामी,जो अपनों ने पाली थी।

भूख बनी आदत जिसकी है,खाने को कब दाना है
तन सर्दी से ठिठुर रहा है,नहीं वस्त्र का ताना है
छत से वंचित जीती देखो,कितनी ही आबादी है
कैसे जाने इसका मतलब,होती क्या आज़ादी है।

खुद को खपा खपा कर जिसने,पेट सभी का पाला है
आज उसी के घर में देखो, फाका डेरा डाला है
मिला दाम कब उसको श्रम का,बस तन की बर्बादी है
कैसे जाने इसका मतलब ,होती क्या आज़ादी है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 18, 2016 at 5:41pm
श्रद्धेय सौरभ सर सादर वन्दे!मैं आप के कहे को ठीक से समझ पा रहा हूँ।आपका मार्गदर्शन मेरे लिए सदैव ही वांच्छित है।मैं कथ्य को पुष्ट करने पर अधिक प्रयास किया करूँगा।इस ओर मुझे अत्यधिक परिश्रम करने आवयश्कता है।आपकी अपेक्षाएं मेरे रचनाकर्म प्रयास को निखार की ओर ले जा रही हैं।आप का मार्गदर्शन यूँ ही बना रहे।सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 18, 2016 at 4:17pm

आदरणीय सतविन्द्र जी, आपकी पकड़ छन्द विधानों के हवाले से मज़बूत होती जा रही है. आप मात्राओं की गणना, शब्द-संयोजन तथा पंक्तियों के विन्यास के हिसाब से सम्यक प्रयास करने लगे हैं. आप अब कथ्य के उन विन्दुओं की ओर भी ध्यान दें, जिनसे कोई बात पाठक तक सहज ही पहुँचती है. किसी पंक्ति से बाहर आता वाक्यभाव सहज और अकृत्रिम हो तो कथ्य का वाकई प्रभाव बढ़ जाता है. 

इन पंक्तियों पर ग़ौर करें आदरणीय - 

राग रंग और मौज मस्ती,क्या उन सबको भाए थे .. यह एक सायास बनाई गयी पंक्ति है जिसका होना-न-होना कोई अर्थ नहीं रखता. 

मिला दाम कब उसको श्रम का,बस तन की बर्बादी है.. इस पंक्ति को लेकर भी मैं बहुत संतुष्ट नहीं हो पाया. ’आज़ादी’ की तुक केलिए ’बर्बादी’ को लाया तो गया है. लेकिन ’बर्बादी’ का निर्वहन ’तन’ के सापेक्ष हो नहीं पाया है.

मैं शिष्टाचारवश नहीं कहूँगा, कि मैं समझ नहीं पाया, या, मेरी यह गलती हो सकती है. आप इन पंक्तियो पर अवश्य ध्यान दीजियेगा. पंक्तियों को लेकर तार्किक रहना अवश्यक है. दूसरे, मैं यह कत्तई नहीं कह रहा कि जैसा मैं चाहता हूँ वैसी ही पंक्तियाँ हों, तभी यह रचना उचित होगी. आप कथ्य के ऊपर अवश्य ध्यान दें आदरणीय.

सादर

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 18, 2016 at 7:42am
मार्गदर्शन हेतु सादर आभार आदरणीय गोपाल सर,मैं पुनः परिष्कार का प्रयास करूँगा।सादर
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 17, 2016 at 9:47pm

राग रंग और मौज मस्ती,क्या उन सबको भाए थे---लय  नही बन रही आदरणीय

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 16, 2016 at 12:44pm
आपसे अनुमोदन पाकर अभिभूत हूँ वन्दनीया कांता दीदी।आपको प्रयास पसन्द आया रचनाकर्म सार्थक हुआ।बहुत् बहुत् आभार सँग सादर वन्दन वन्दनीया!
Comment by kanta roy on August 16, 2016 at 11:01am

वरण किया जो लेकर आए,उसको वे मतवाले थे
आजादी की दुल्हन खातिर,खुद मिट जाने वाले थे।---वाह ! लाजवाब  रचना है  ये  आपकी  आदरणीय  सतविन्द्र  जी .बधाई  प्रेषित  है .

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