For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ताटंक छ्न्द

पास खड़ी है सजधज कर वह,दुल्हन सबसे प्यारी है
सबको वही पसन्द बहुत है,देखो सबसे न्यारी है
वरण किया जो लेकर आए,उसको वे मतवाले थे
आजादी की दुल्हन खातिर,खुद मिट जाने वाले थे।

देकर अपनी आहुति जो भी,आजादी को लाए थे
राग रंग और मौज मस्ती,क्या उन सबको भाए थे
कुछ तो तोड़ गये थे बेड़ी, जो गैरों ने डाली थी
अबतक भी है घोर गुलामी,जो अपनों ने पाली थी।

भूख बनी आदत जिसकी है,खाने को कब दाना है
तन सर्दी से ठिठुर रहा है,नहीं वस्त्र का ताना है
छत से वंचित जीती देखो,कितनी ही आबादी है
कैसे जाने इसका मतलब,होती क्या आज़ादी है।

खुद को खपा खपा कर जिसने,पेट सभी का पाला है
आज उसी के घर में देखो, फाका डेरा डाला है
मिला दाम कब उसको श्रम का,बस तन की बर्बादी है
कैसे जाने इसका मतलब ,होती क्या आज़ादी है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 587

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 18, 2016 at 5:41pm
श्रद्धेय सौरभ सर सादर वन्दे!मैं आप के कहे को ठीक से समझ पा रहा हूँ।आपका मार्गदर्शन मेरे लिए सदैव ही वांच्छित है।मैं कथ्य को पुष्ट करने पर अधिक प्रयास किया करूँगा।इस ओर मुझे अत्यधिक परिश्रम करने आवयश्कता है।आपकी अपेक्षाएं मेरे रचनाकर्म प्रयास को निखार की ओर ले जा रही हैं।आप का मार्गदर्शन यूँ ही बना रहे।सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 18, 2016 at 4:17pm

आदरणीय सतविन्द्र जी, आपकी पकड़ छन्द विधानों के हवाले से मज़बूत होती जा रही है. आप मात्राओं की गणना, शब्द-संयोजन तथा पंक्तियों के विन्यास के हिसाब से सम्यक प्रयास करने लगे हैं. आप अब कथ्य के उन विन्दुओं की ओर भी ध्यान दें, जिनसे कोई बात पाठक तक सहज ही पहुँचती है. किसी पंक्ति से बाहर आता वाक्यभाव सहज और अकृत्रिम हो तो कथ्य का वाकई प्रभाव बढ़ जाता है. 

इन पंक्तियों पर ग़ौर करें आदरणीय - 

राग रंग और मौज मस्ती,क्या उन सबको भाए थे .. यह एक सायास बनाई गयी पंक्ति है जिसका होना-न-होना कोई अर्थ नहीं रखता. 

मिला दाम कब उसको श्रम का,बस तन की बर्बादी है.. इस पंक्ति को लेकर भी मैं बहुत संतुष्ट नहीं हो पाया. ’आज़ादी’ की तुक केलिए ’बर्बादी’ को लाया तो गया है. लेकिन ’बर्बादी’ का निर्वहन ’तन’ के सापेक्ष हो नहीं पाया है.

मैं शिष्टाचारवश नहीं कहूँगा, कि मैं समझ नहीं पाया, या, मेरी यह गलती हो सकती है. आप इन पंक्तियो पर अवश्य ध्यान दीजियेगा. पंक्तियों को लेकर तार्किक रहना अवश्यक है. दूसरे, मैं यह कत्तई नहीं कह रहा कि जैसा मैं चाहता हूँ वैसी ही पंक्तियाँ हों, तभी यह रचना उचित होगी. आप कथ्य के ऊपर अवश्य ध्यान दें आदरणीय.

सादर

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 18, 2016 at 7:42am
मार्गदर्शन हेतु सादर आभार आदरणीय गोपाल सर,मैं पुनः परिष्कार का प्रयास करूँगा।सादर
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 17, 2016 at 9:47pm

राग रंग और मौज मस्ती,क्या उन सबको भाए थे---लय  नही बन रही आदरणीय

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 16, 2016 at 12:44pm
आपसे अनुमोदन पाकर अभिभूत हूँ वन्दनीया कांता दीदी।आपको प्रयास पसन्द आया रचनाकर्म सार्थक हुआ।बहुत् बहुत् आभार सँग सादर वन्दन वन्दनीया!
Comment by kanta roy on August 16, 2016 at 11:01am

वरण किया जो लेकर आए,उसको वे मतवाले थे
आजादी की दुल्हन खातिर,खुद मिट जाने वाले थे।---वाह ! लाजवाब  रचना है  ये  आपकी  आदरणीय  सतविन्द्र  जी .बधाई  प्रेषित  है .

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
yesterday
amita tiwari posted a blog post

गर्भनाल कब कट पाती है किसी की

कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी…See More
yesterday
vijay nikore commented on Sushil Sarna's blog post दोहा दशम. . . . . उम्र
"भाई सुशील जी, सारे दोहे जीवन के यथार्थ में डूबे हुए हैं.. हार्दिक बधाई।"
Tuesday
vijay nikore posted a blog post

प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजतेभावनात्मक अवरोधों के दबाव मेंकभी ऐसा भी तो होता है ...समय समय से रूठ जाता…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"प्रारम्भ (दोहे) अंत भला तो सब भला, कहते  सब ये बात। क्या आवश्यक है नहीं, इक अच्छी…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"आदरणीय  जयहिंद रायपुरी जी अच्छा हायकू लिखा है आपने. किन्तु हायकू छोटी रचना है तो एक से अधिक…"
Sunday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"हाइकु प्रारंभ है तो अंत भी हुआ होगा मध्य में क्या था मौलिक एवं अप्रकाशित "
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"स्वागतम"
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Apr 8
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Apr 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Apr 6
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Apr 3

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service