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ग़ज़ल : - राग मुझको सुहाता नहीं दोस्तो

ग़ज़ल : - राग  मुझको सुहाता नहीं दोस्तो !

राग  मुझको सुहाता नहीं दोस्तो ,

मैं कोई गीत गाता नहीं दोस्तो |

 

खूबसूरत ज़हन का तलबगार हूँ ,

रूप कोई भी भाता नहीं दोस्तो |

 

ये मकाँ मेरे पुरखों की जागीर है ,

अब इधर कोई आता नहीं दोस्तो |

 

धूप की मेरे आँगन में आमद नही ,

और मैं केक्टस उगाता नही दोस्तो |

 

राह की दूब शबनम से धोई हुई ,

पांव आगे बढाता नहीं दोस्तो |

 

छीनकर खाने वालों के इस दौर में ,

मांगकर भी मैं खाता नहीं दोस्तो |

 

टूटकर जिसने अपना बनाया हो घर ,

बस्तियां वो ढहाता नहीं दोस्तो |

 

गाँव के बच्चे पढ़ने को आतुर बहुत ,

कोई उनको पढाता नहीं दोस्तो |

 

(अभिनव अरुण की डायरी से बकलम खुद )

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on May 16, 2011 at 11:30am
बहुत शुक्रिया शील जी आपकी टिप्पणी मेरा हौसला बढ़ाएगी |
Comment by Abhinav Arun on May 16, 2011 at 11:30am

आभार कपूर साहब ! आपने जैसा कहा शेर वैसा ही होना चाहिये था ! चार चंद लग गये ग़ज़ल में !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Tilak Raj Kapoor on May 15, 2011 at 11:50pm

वाह भाई वाह।

देखकर दूब शबनम से धोई हुई ,

पांव आगे बढाता नहीं दोस्तो |

Comment by Sheel Kumar on May 15, 2011 at 10:38pm
सुन्दर भाव संयोजन .....बधाई ..
Comment by Abhinav Arun on May 15, 2011 at 10:02pm
प्रिय बागी भाई आपकी इस विस्तृत समीक्षा ने मेरी ग़ज़ल को और भी खूबसूरती अता की है मैं आपके शब्दों के लिये आभारी हूँ | दरअसल समीक्षक और समालोचकों की बड़ी भूमिका होती है एक राईटर की मेकिंग में | थैंक्स अगेन !!

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 15, 2011 at 9:30pm

//राग  मुझको सुहाता नहीं दोस्तो ,

मैं कोई गीत गाता नहीं दोस्तो // बहुत ही गहरे भाव, खुबसूरत मतला,

 

//खूबसूरत ज़हन का तलबगार हूँ ,

रूप कोई भी भाता नहीं दोस्तो // true beauty ढूंढने वालों को रूप से क्या लेना, सुंदर शेर ,

 

//ये मकाँ मेरे पुरखों की जागीर है ,

अब इधर कोई आता नहीं दोस्तो // वोहो ! दिल में सीधे उतर जाने वाला शे'र , सच सबके बस की बात नहीं |

 

//धूप की मेरे आँगन में आमद नही ,

और मैं केक्टस उगाता नही दोस्तो // बहुत खूब अरुण भाई , फूलों की चाहत रखने वालों को काँटों से क्या काम ?

 

//राह की दूब शबनम से धोई हुई ,

पांव आगे बढाता नहीं दोस्तो //  खुद अपनी राह बनाने वाले कटीले और धुल धूसरित राह से परहेज कहा करते, उन्हें तो बस चलते जाना है | बेहतरीन ख्याल |

 

//छीनकर खाने वालों के इस दौर में ,

मांगकर भी मैं खाता नहीं दोस्तो //  वॉय होय , पुनः एक और दिल छूने वाला शे'र , बहुत खूब ,

 

//टूटकर जिसने अपना बनाया हो घर ,

बस्तियां वो ढहाता नहीं दोस्तो // सच बयानी , जिसने मर्म समझा है वाही जाने |

 

//गाँव के बच्चे पढ़ने को आतुर बहुत ,

कोई उनको पढाता नहीं दोस्तो // बदनसीबी है अरुण भाई, बच्चो को क पढने के लिए भी आज संघर्ष करना पड़ रहा |

 

कुल मिलाकर एक बेहतरीन ग़ज़ल , बधाई स्वीकार करे |

कृपया ध्यान दे...

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