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ज़लज़ला /सुरेश कुमार ' कल्याण '

छब्बीस जनवरी
दो हजार एक
भारत का
बावनवां गणतंत्र दिवस
खुशियां थी अपार
सारी खुशियाँ
एक झटके से
बह गई ।

दिन चढ़ते ही
शुरू हुआ
विनाश का तांडव
अटारियाँ सारी
एक झटके से ढह गई ।

लील गया
हजारों जिंदगियां
लाखों घर
हुए नेस्तनाबूत।

गुजरात प्रांत
इक्कीस जिले
जलजले से
सारे हिले।
लाखों लोग
बेघर हो गए।

गांव के गांव
शहर के शहर
मिट्टी में मिल गए
जमींदोज हो गई
ऐतिहासिक इमारतें
घर स्कूल अस्पताल
सब
स्वाहा हो गए।

जो मर गए
बच गए
बरबादी देखने से
जो बच गए
पत्थर दिल सह गए।

गिरे मन्दिर मसीत
और
गुरूघर
बच्चे हुए अनाथ
सब कुछ
खत्म हुआ पर
रह गए
मिट्टी के ढेर।

फट गई जमीं
लावा उबला
पड़ गई दरारें
राहतकर्मी और फौजी
लाशें
गिनते ही रह गए।

जापान पाकिस्तान
अमेरिका
समस्त देश
राहत सामग्री
भेजते ही रह गए।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 19, 2016 at 8:27pm
आदरणीय श्री नवीन मणि त्रिपाठी जी सादर आभार ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on October 19, 2016 at 7:03pm
वाह भाई श्री बेहतरीन रचना लिखी है आपने ।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 18, 2016 at 4:33pm
आदरणीय श्री सुशील सरना जी रचना को सम्मान देने के लिए हार्दिक आभार । सादर ।
Comment by Sushil Sarna on October 18, 2016 at 1:26pm

आदरणीय सुरेश जी हृदय विदारक घटना को  आपने शब्द चित्र की माध्यम से जीवंत कर दिया है।  हार्दिक बधाई स्वीकार करें। 

कृपया ध्यान दे...

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