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कचरे का लोकतंत्र या कचरे में लोकतंत्र (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

दीपावली पर्व की अगली सुबह थी या किसी बड़े जश्न की, ... लोकतंत्र सड़क पर था। जले हुए पटाखों व आतिशबाजी का लोकतंत्र था। अनेकता में एकता। विविधता। रंगभेद, जात-पांत रहित राष्ट्रीय ही नहीं वैश्विक नस्लों का मेल-जोल। सभी की ग़ज़ब की सहभागिता। देशी, विदेशी पटाखों व आतिशबाजी के जले हुए अवशेष नागरिकों के लोकतंत्र को चिढ़ा रहे थे। उधर सीमा पर दुर्योग दो पड़ोसी लोकतंत्रों के घात-प्रतिघात से परिलक्षित शहादतों पर नारेबाज़ी और भाषणबाज़ी करवा रहे थे। लोकतंत्र कचरे में तब्दील लग रहे थे। इधर स्वच्छता अभियान के नारे और भाषण 'एक झाड़ू' में समाये नज़र आ रहे थे! सफाई कर्मचारी की चौड़ी छाती सबको नज़र आ रही थी। सब को उस पर गर्व था, उससे उम्मीदें थीं।

"कचरे का लोकतंत्र अब ज़मीन से उठ जायेगा, रास्ता साफ़ हो जायेगा!" एक मीडिया कर्मी ने कैमरे से तस्वीरें लेते हुए व्यंगात्मक लहज़े में कहा।

यह सुनकर उसके सहयोगी ने कहा- "परन्तु यह रास्ता अगले 'कचरा अभियान' की ओर ही जायेगा न, सभी की परम्परागत सहभागिता से!"

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 21, 2016 at 5:09pm
रचना पर समय देकर प्रोत्साहित करने के लिए सभी सुधी पाठकगण [विउअर्ज़) को हृदयतल से बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 6, 2016 at 10:51am
मेरी रचना का अनुमोदन करती बढ़िया टिप्पणी व हौसला अफ़ज़ाई हेतु तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम जनाब तस्दीक़ अहमद ख़ान साहब।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 31, 2016 at 10:09am

मोहतरम जनाब शेख शहज़ाद उस्मानी साहिब, सियासत और समाज को आईना दिखाती सुन्दर लघुकथा के लिए मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं

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