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दिवाली – ( लघुकथा ) –

दिवाली – ( लघुकथा )  –

 "अम्मा, हम लोग दिवाली क्यों नहीं मनाते, हमारी हर रात एक जैसी ही रहती है, न पटाखे, न रोशनी की लड़ियां, न नये कपड़े, न खीर पूड़ी वाले पकवान"।

"मनायेंगे मेरी बिट्टो, अगली साल जरूर मनायेंगे"।

"अम्मा, अगली साल ऐसा क्या होने वाला है"।

"तेरा बापू आयेगा परदेश से, ढेर सारे पैसे लेकर, इसलिये"।

"अम्मा, यही तसल्ली तुम पिछले तीन साल से दे रही हो"।

"बिटिया, तुम्हारे भाग्य में कम से कम यह तसल्ली तो है, बहुत लोगों के नसीब में तो यह तसल्ली भी नहीं है"।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on October 31, 2016 at 10:15pm

हार्दिक आभार आदरणीय समर क़बीर साहब जी। हमारी तरफ़ से भी दिवाली की हार्दिक बधाई क़बूल फ़रमायें। नेट की समस्या के कारण जवाब देने में हुई देरी के लिये क्षमा चाहूंगा।

Comment by Samar kabeer on October 30, 2016 at 9:21pm
जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब,बहुत ही मार्मिक,और गरीबों की दशा बताती हुई लघुकथा लिखी है,आपने,पंच लाइन ने दिल को छू लिया,इस बहतरीन प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
मेरी तरफ़ से आपको और आपके परिवार को दीपावली की बधाई और शुभकामनायें स्वीकार कीजिए ।
Comment by TEJ VEER SINGH on October 29, 2016 at 2:03pm

हार्दिक आभार आदरणीय शेख उस्मानी जी।आपको भी दिवाली की हार्दिक बधाई।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 28, 2016 at 8:48pm
बहुत गंभीर बात बड़ी सहजता से सहज वार्तालाप में कम शब्दों में कहते हुए बढ़िया प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत हार्दिक बधाई आपको आदरणीय तेज वीर सिंह जी। दीपावली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।

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