For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल...भुलाने में मुझको ज़माने लगेंगे

बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम
फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन्
122 122 122 122
वो पलछिन सभी याद आने लगेंगे
भुलाने में मुझको ज़माने लगेंगे

यहाँ बैठ कर हमने खाई हैं कसमें
ये पत्थर सनम गुनगुनाने लगेंगे

यूँ ही रूठने मान जाने के मंजर
यकीं मानिये सब सुहाने लगेंगे

सरे आइना जो मेरा अक्स होगा
वो दर्पन से नजरें चुराने लगेंगे

सखी हाल दिल का कभी पूँछ लेगी
कभी हाले दिल आजमाने लगेंगे

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Views: 846

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 27, 2016 at 8:51am
शुभप्रभात आदरणीय समर कबीर जी प्रणाम...अब अँधेरा छट रहा है..आपके ह्रदय की विशालता को नमन करता हूँ आपने अपना अमूल्य समय देकर मेरी शंकाओं का निराकरण किया..आपकी और आदरणीय गिरिराज जी सुझावों को ध्यान में रखते हुए कोशिश करता हूँ कुछ अच्छा सुधार कर सकूँ..
Comment by Samar kabeer on November 26, 2016 at 10:35pm
मैं आपकी शंका दूर करने का प्रयास करता हूँ ।
आपका ये शैर ध्यान से देखिये:-
"जहाँ बैठ कर हमने खाई थीं क़समें
वो पत्थर सनम गुनगुनाने लगेंगे"
ऊला मिसरे में हाल और माज़ी दोनों शामिल हैं,यानी आप अपने महबूब को आज ये बता रहे हैं कि हमने जहाँ बैठ कर क़समें खाई थीं,इसमें दो काल हो गये, हाल और माज़ी,फिर सानी मिसरे में भविष्य की बात हो रही है,कि 'लगेंगे',अब इस तरह तीन काल एक ही शैर में क्या मुनासिब है ?दो काल तो ठीक है लेकिन तीन नहीं ।
ये इसलिये हो रहा है कि आप शैर बात-चीत के लहजे में कह रहे हैं,अगर आप ख़ुद को और किसी और को शामिल न कर के शैर कहेंगे तो आपकी रदीफ़ पूरा काम करेगी,मिसाल के तौर पर इस शैर को अगर यूँ कर दें तो बात बन जायेगी:-
"जहाँ बैठ कर हमने खाई क़सम है
ये ये पत्थर सनम गुनगुनाने लगेंगे"
उम्मीद है आपकी शंका का समाधान हो गया होगा ?
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 26, 2016 at 11:49am
प्रणाम आदरणीय गिरिराज जी..हमेशा की तरह आपके सुझाव बेहद खूबसूरत हैं लेकिन अभी मेरे मन में कुछ संशय शेष हैं..मुझे लगता है 'लगेंगे'शब्द साफ साफ भविष्य की ओर इशारा कर रहा है तो कमी क्या है?क्या एक शैर में दो कालखंडों को समेटना उचित नहीं है??अन्यथा न लें आदरणीय आपके सुझावों से जो कमी है वो तो दूर हो जायेगी लेकिन मेरे मन का शंशय नहीं..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 26, 2016 at 11:43am
हौसलाफ़ज़ाइ के लिए आपका शुक्रिया आदरणीय शिज्जु "शकूर" जी..अवश्य आदरणीय गिरिराज जी के सुझाव खूबसूरत हैं..लेकिन कुछ संशय हैं जिन्हें दूर करने की कोशिश कर रहा हूँ..
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 26, 2016 at 11:40am
आदरणीय समर जी प्रणाम थोड़ा सा प्रकाश और डालिये..क्या एक मिसरे में आज और दूसरे में कल की बात करना नियमों के हिसाब से गलत है?दूसरे शैर में उला मिसरा भूतकाल को इंगित कर रहा है जबकि सानी मिसरा भविष्य की ओर..ग़ज़ल का सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है आप लोगों को पढ़ के ही सीख़ रहा हूँ...सादर
Comment by Samar kabeer on November 25, 2016 at 9:16pm
ऊला मिसरे में आप आज की बात कर रहे हैं और सानी मिसरा भविष्य की बात कह रहा है,बस इतनी सी बात है । बाकी जो शेष है वो जनाब गिरिराज भाई बता देंगे ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 25, 2016 at 7:30pm
देर से आने के लिए क्षमा चाहता हूँ आदरणीय समर साहब..सच ये है कि मैं कई बार आपकी बात आदरणीय गिरिराज जी के सुझाव पढ़ चूका हूँ..और मानता हूँ अगर आपने कमी इंगित की है तो कमी होगी..लेकिन मैं कमी समझ नहीं पा रहा हूँ..आदरणीय गिरिराज जी के सुझाव बहुत ही खूबसूरत हैं...निश्चय ही मैं उनके सुझावों को आत्मसात करूँगा लेकिन अगर आप मेरा संशय थोडा विस्तार दे कर दूर करें तो मैं बहुत कुछ सीख सकूँगा..सादर
Comment by Samar kabeer on November 23, 2016 at 5:26pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी ने मेरे कहने का मतलब समझ लिया और सही इस्लाह दी है ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 23, 2016 at 11:10am

आदरणीय बृजेश जी अच्छा प्रयास है, आ. गिरिराज भंडारी जी के सुझावों से ग़ज़ल में और निखार आ गया है


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 23, 2016 at 10:42am

आदरनीय बृजेश भाई , आ. समर भाई के सुझारे शे र को ऐसा किया जा सकता है - --

जहाँ बैठ कर हमने खाई थीं कसमें
वो पत्थर सनम गुनगुनाने लगेंगे ----- इसे ऐसा कर लें

जहाँ बैठ कर हमने खाई थीं कसमें
वो पत्थर भी कल गुनगुनाने लगेंगे

और  इसे
यूँ ही रूठने मान जाने के मंजर
यकीं मानिये सब सुहाने लगेंगे      -- ऐसा कर लें

यूँ ही रूठने मान जाने के मंजर
 कभी तो तुम्हें भी सुहाने लगेंगे

अगर पसंद न आये तो और कुछ कह सकते हैं ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

*दोहा*बरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।।*चौपाई*वह फुहार वह साथ…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Tuesday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Tuesday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service