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ग़ज़ल...भुलाने में मुझको ज़माने लगेंगे

बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम
फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन्
122 122 122 122
वो पलछिन सभी याद आने लगेंगे
भुलाने में मुझको ज़माने लगेंगे

यहाँ बैठ कर हमने खाई हैं कसमें
ये पत्थर सनम गुनगुनाने लगेंगे

यूँ ही रूठने मान जाने के मंजर
यकीं मानिये सब सुहाने लगेंगे

सरे आइना जो मेरा अक्स होगा
वो दर्पन से नजरें चुराने लगेंगे

सखी हाल दिल का कभी पूँछ लेगी
कभी हाले दिल आजमाने लगेंगे

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 27, 2016 at 8:51am
शुभप्रभात आदरणीय समर कबीर जी प्रणाम...अब अँधेरा छट रहा है..आपके ह्रदय की विशालता को नमन करता हूँ आपने अपना अमूल्य समय देकर मेरी शंकाओं का निराकरण किया..आपकी और आदरणीय गिरिराज जी सुझावों को ध्यान में रखते हुए कोशिश करता हूँ कुछ अच्छा सुधार कर सकूँ..
Comment by Samar kabeer on November 26, 2016 at 10:35pm
मैं आपकी शंका दूर करने का प्रयास करता हूँ ।
आपका ये शैर ध्यान से देखिये:-
"जहाँ बैठ कर हमने खाई थीं क़समें
वो पत्थर सनम गुनगुनाने लगेंगे"
ऊला मिसरे में हाल और माज़ी दोनों शामिल हैं,यानी आप अपने महबूब को आज ये बता रहे हैं कि हमने जहाँ बैठ कर क़समें खाई थीं,इसमें दो काल हो गये, हाल और माज़ी,फिर सानी मिसरे में भविष्य की बात हो रही है,कि 'लगेंगे',अब इस तरह तीन काल एक ही शैर में क्या मुनासिब है ?दो काल तो ठीक है लेकिन तीन नहीं ।
ये इसलिये हो रहा है कि आप शैर बात-चीत के लहजे में कह रहे हैं,अगर आप ख़ुद को और किसी और को शामिल न कर के शैर कहेंगे तो आपकी रदीफ़ पूरा काम करेगी,मिसाल के तौर पर इस शैर को अगर यूँ कर दें तो बात बन जायेगी:-
"जहाँ बैठ कर हमने खाई क़सम है
ये ये पत्थर सनम गुनगुनाने लगेंगे"
उम्मीद है आपकी शंका का समाधान हो गया होगा ?
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 26, 2016 at 11:49am
प्रणाम आदरणीय गिरिराज जी..हमेशा की तरह आपके सुझाव बेहद खूबसूरत हैं लेकिन अभी मेरे मन में कुछ संशय शेष हैं..मुझे लगता है 'लगेंगे'शब्द साफ साफ भविष्य की ओर इशारा कर रहा है तो कमी क्या है?क्या एक शैर में दो कालखंडों को समेटना उचित नहीं है??अन्यथा न लें आदरणीय आपके सुझावों से जो कमी है वो तो दूर हो जायेगी लेकिन मेरे मन का शंशय नहीं..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 26, 2016 at 11:43am
हौसलाफ़ज़ाइ के लिए आपका शुक्रिया आदरणीय शिज्जु "शकूर" जी..अवश्य आदरणीय गिरिराज जी के सुझाव खूबसूरत हैं..लेकिन कुछ संशय हैं जिन्हें दूर करने की कोशिश कर रहा हूँ..
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 26, 2016 at 11:40am
आदरणीय समर जी प्रणाम थोड़ा सा प्रकाश और डालिये..क्या एक मिसरे में आज और दूसरे में कल की बात करना नियमों के हिसाब से गलत है?दूसरे शैर में उला मिसरा भूतकाल को इंगित कर रहा है जबकि सानी मिसरा भविष्य की ओर..ग़ज़ल का सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है आप लोगों को पढ़ के ही सीख़ रहा हूँ...सादर
Comment by Samar kabeer on November 25, 2016 at 9:16pm
ऊला मिसरे में आप आज की बात कर रहे हैं और सानी मिसरा भविष्य की बात कह रहा है,बस इतनी सी बात है । बाकी जो शेष है वो जनाब गिरिराज भाई बता देंगे ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 25, 2016 at 7:30pm
देर से आने के लिए क्षमा चाहता हूँ आदरणीय समर साहब..सच ये है कि मैं कई बार आपकी बात आदरणीय गिरिराज जी के सुझाव पढ़ चूका हूँ..और मानता हूँ अगर आपने कमी इंगित की है तो कमी होगी..लेकिन मैं कमी समझ नहीं पा रहा हूँ..आदरणीय गिरिराज जी के सुझाव बहुत ही खूबसूरत हैं...निश्चय ही मैं उनके सुझावों को आत्मसात करूँगा लेकिन अगर आप मेरा संशय थोडा विस्तार दे कर दूर करें तो मैं बहुत कुछ सीख सकूँगा..सादर
Comment by Samar kabeer on November 23, 2016 at 5:26pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी ने मेरे कहने का मतलब समझ लिया और सही इस्लाह दी है ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 23, 2016 at 11:10am

आदरणीय बृजेश जी अच्छा प्रयास है, आ. गिरिराज भंडारी जी के सुझावों से ग़ज़ल में और निखार आ गया है


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 23, 2016 at 10:42am

आदरनीय बृजेश भाई , आ. समर भाई के सुझारे शे र को ऐसा किया जा सकता है - --

जहाँ बैठ कर हमने खाई थीं कसमें
वो पत्थर सनम गुनगुनाने लगेंगे ----- इसे ऐसा कर लें

जहाँ बैठ कर हमने खाई थीं कसमें
वो पत्थर भी कल गुनगुनाने लगेंगे

और  इसे
यूँ ही रूठने मान जाने के मंजर
यकीं मानिये सब सुहाने लगेंगे      -- ऐसा कर लें

यूँ ही रूठने मान जाने के मंजर
 कभी तो तुम्हें भी सुहाने लगेंगे

अगर पसंद न आये तो और कुछ कह सकते हैं ।

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