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प्यार में हम भी हद से गुज़र जायेंगे - बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

अरकान – 212 2    122   122   12

काले बादल कभी जब बिखर जायेंगे |

ए नजारे भी बेशक बदल जायेंगे |

 

मुस्कुरा के ना देखो हमें आज यूँ,

दिल के अरमाँ हमारे मचल जायेंगे|

 

हमको मारो न खंज़र से ऐ महज़बी,

रूठ जाओ तो हम यूँ ही मर जायेंगे|

 

आके देखो कभी तुम हमारी गली,

ए इरादे तुम्हारे बदल जायेंगे|

 

लैला-मजनू हैं क्या शीरी फरहाद क्या,

प्यार में हम भी हद से गुज़र जायेंगे|

 

संग दिल हैं वे लेकिन मैं हूँ  मुतमइन,

सुनके रुदाद मेरी पिघल जायेंगे|

 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by गिरिराज भंडारी on November 28, 2016 at 7:47pm

आदरनीय बैज नाथ भाई , बहर खूब निभा लिया है आपने  , बातें भी अच्छी कही है , हार्दिक बधाइयाँ प्रयास के लिये । लेकिन काफिया न होने से आपकी रचना गज़ल होने से रह गई है ।

Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 27, 2016 at 6:56pm

आदरणीय गोपाल साहेब व समीर साहेब ..............बहुत बहुत शुक्रिया ............मैं इस ग़ज़ल को सुधार कर पुन: पोस्ट करूँगा | 

Comment by Samar kabeer on November 26, 2016 at 11:02pm
जनाब मिंटू साहिब आदाब,मैं जनाब गोपाल नारायण जी से सहमत हूँ,ग़ज़ल में क़ाफ़िया तय कीजिये क्या लेना चाहते है ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 26, 2016 at 5:20pm

इस  गजल में काफिया नहीं है . र ल से  अ का स्वर निकलता है  काफिया  दीर्घ स्वर का ही होता है

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