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अदृश्य जीत (लघुकथा)

जंगल के अंदर उस खुले स्थान पर जानवरों की भारी भीड़ जमा थी। जंगल के राजा शेर ने कई वर्षों बाद आज फिर खरगोश और कछुए की दौड़ का आयोजन किया था।

 

पिछली बार से कुछ अलग यह दौड़, जानवरों के झुण्ड के बीच में सौ मीटर की पगडंडी में ही संपन्न होनी थी। दोनों प्रतिभागी पगडंडी के एक सिरे पर खड़े हुए थे। दौड़ प्रारंभ होने से पहले कछुए ने खरगोश की तरफ देखा, खरगोश उसे देख कर ऐसे मुस्कुरा दिया, मानों कह रहा हो, "सौ मीटर की दौड़ में मैं सो जाऊँगा क्या?"

 

और कुछ ही क्षणों में दौड़ प्रारंभ हो गयी।

 

खरगोश एक ही फर्लांग में बहुत आगे निकल गया और कछुआ अपनी धीमी चाल के कारण उससे बहुत पीछे रह गया।

 

लगभग पचास मीटर दौड़ने के बाद खरगोश रुक गया, और चुपचाप खड़ा हो गया।

 

कछुआ धीरे-धीरे चलता हुआ, खरगोश तक पहुंचा। खरगोश ने कोई हरकत नहीं की। कछुआ उससे आगे निकल कर सौ मीटर की पगडंडी को भी पार कर गया, लेकिन खरगोश वहीँ खड़ा रहा।

 

कछुए के जीतते ही चारों तरफ शोर मच गया, जंगल के जानवरों ने यह तो नहीं सोचा कि खरगोश क्यों खड़ा रह गया और वे सभी चिल्ला-चिल्ला कर कछुए को बधाई देने लगे।

 

कछुए ने पीछे मुड़ कर खरगोश की तरफ देखा, जो अभी भी पगडंडी के मध्य में ही खड़ा हुआ था। उसे देख खरगोश फिर मुस्कुरा दिया, वह सोच रहा था,

"यह कोई जीवन की दौड़ नहीं है, जिसमें जीतना ज़रूरी हो। खरगोश की वास्तविक गति कछुए के सामने बताई नहीं जाती।"

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 11, 2016 at 8:07pm

बहुत बेहतर लघुकथा आदरणीय चंद्रेश जी। एक वास्तविक सच को बहुत ख़ूबसूरती से उकेरती लघुकथा

Comment by TEJ VEER SINGH on December 11, 2016 at 4:57pm

बेहतरीन प्रस्तुति। हार्दिक बधाई आदरणीय चंद्रेश जी।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 11, 2016 at 12:06pm
बहुत ही सकारात्मक आयाम देते हुए ' सच्चे बड़प्पन' के बेहतरीन प्रेरक संदेश सम्प्रेषित करती बेहतरीन लघुकथा के लिए तहे दिल से बहुत बहुत मुबारकबाद मोहतरम जनाब चन्द्रेश कुमार छतलानी साहब।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 8, 2016 at 11:58pm

आदरणीय चंद्रेश जी, बहुत बढ़िया लघुकथा लिखी है आपने. हार्दिक बधाई. सादर 

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