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2122 2122
नोट बंदी बावरी-सी
देखते हैं क्या करेगी।1

जो चलन को कैद करते
क्या भला उनसे लड़ेगी?2

बेचलन होते 'पुराने'
क्या 'नयों' से घर भरेगी?3

काठ की हांडी कहें कुछ
क्या नहीं फिर से चढ़ेगी?4

जो हरें दिन के उजाले
क्या नहीं उनको खलेगी?5

बात क्षणभर की नहीं यह
दूर तक आगे चलेगी।6

थम रहा है शोर अब तो
फूल बन कर ही खिलेगी।7

जो अंधेरों से लड़ेगा
रे सुबह उसको मिलेगी।8

कीजिये मन से 'मनन' तो
आस बन फिर से पलेगी।9
मौलिक व अप्रकाशित @

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Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 3, 2017 at 12:36pm
आद0 मनन कुमार सिंह जी, उम्दा गजल हुयी है, हर शेर पर दाद हाजिर है
Comment by Samar kabeer on January 2, 2017 at 2:30pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई,दाद के साथ बधाई स्वीकार करें ।

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