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गजल(इश्क को तोलते हैं कहाँ)

212 212 212
इश्क को तोलते हैं कहाँ,
जो तुले,बोलते हैं कहाँ?1

सिसकियाँ हों बँधी गाँठ में,
बावरी! खोलते हैं कहाँ?2

ऐ हवा! तू उड़ा के चुनर
पूछ, हम डोलते हैं कहाँ?3

गम पिये बस जिये अब तलक,
हम जहर घोलते हैं कहाँ?4

चूमते धड़कनें चाव से,
खुद कभी बोलते हैं कहाँ?5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on February 19, 2017 at 9:30pm
आदरणीय गिरिराज भाई,आपकी प्रेरणा परक टिप्पणी हमेशा फलदायी रही है आपका दिली आभार व्यक्त करता हूँ,सादर।
Comment by Manan Kumar singh on February 19, 2017 at 9:29pm
आदरणीय महेंद्र कुमार जी,गजल आपको पसंद आयी,यह रचना के लिए मान की बात है।आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 19, 2017 at 8:56pm

आदरनीय मनन भाई , क्या बात है , बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है , बधाइयाँ .....आपको ।

Comment by Mahendra Kumar on February 19, 2017 at 11:59am
बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने आदरणीय मनन जी। हार्दिक बधाई प्रेषित है। सादर।
Comment by Manan Kumar singh on February 17, 2017 at 7:19am
आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ पांडेय जी,सादर।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 16, 2017 at 11:54pm

दिल से बधाई लीजिए आदरणीय मनन जी. बहुत खूब ! 

सिसकियाँ हों बँधी गाँठ में,
बावरी! खोलते हैं कहाँ? ................ कमाल साहब, कमाल !

Comment by Manan Kumar singh on February 16, 2017 at 9:26pm
आपका आभार आदरणीय आशुतोष मिश्र जी।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 16, 2017 at 8:33pm
आदरणीय मनन जी इस रचना पर हार्दिक बधाई सादर
Comment by Manan Kumar singh on February 15, 2017 at 7:39pm
आदरणीय सुरेन्द्र नाथ जी नमन!आपकी शेर दर शेर सराहना गजल की लघुता को मन-ग्राहकता बख्शतीं है,सादर।
Comment by Manan Kumar singh on February 15, 2017 at 7:37pm
आदरणीय समर साहिब नमस्ते!आपके अनुमोदन से गजल का मान बढ़ा है,सादर।

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