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सुनें वो गर नहीं,तो बार बार कह दूँ क्या
है बोलने का मुझे इख़्तियार, कह दूँ क्या
शज़र उदास है , पत्ते हैं ज़र्द रू , सूखे
निजाम ए बाग़ है पूछे , बहार कह दूँ क्या
कहाँ तलाश करूँ रूह के मरासिम मैं
लिपट रहे हैं महज़ जिस्म, प्यार कह दूँ क्या
यूँ तो मैं जीत गया मामला अदालत में
शिकश्ता घर मुझे पूछे है, हार कह दूँ क्या
यूँ मुश्तहर तो हुआ पैरहन ज़माने में
हुआ है ज़िस्म का भी इश्तिहार, कह दूँ क्या
हाँ, लहज़ा तल्ख़ था लेकिन कही हक़ीकत थी
ज़रा सा पूछ तो लेते, कि ख़ार कह दूँ क्या
वो, एक लम्हा भी जिसने मुझे हँसाया है
ये दिल कहे, उसे परवर दिगार कह दूँ क्या
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मौलिक एवँ अप्रकाशित
Comment
आदरनीय आमोद भाई , उत्साहवर्धन के लिये आपका हृदय से आभार ।
आदरनीय महेन्द्र भाई , उत्साहवर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ।
आदरणीय सुरेन्द्र भाई , हौसला अफज़ाई का बहुत शुक्रिया आपका ।
आदरणीय राघव भाई , प्रवास मे होने के कारण आभार प्रदर्शन के लिये देरे से उपस्थित हो पाया , क्षमाप्रार्थी हूँ ।
आदरनीय , अच्छा लगा ये जान कर कि हमारे ओ बी ओ परिवार मे एक और उस्ताद शायर शामिल हुये हैं , जिनके अनुभव से हम सभी का भला होगा ।
आपकी सलाह सर आखों पर , लेकिन एक आध शेर आप उदाह्हरण स्वरूप आप सुधार कर बता देते तो मुझे सुधार में आसानी होती ।
मेरे प्रति आपकी धारणा -- जो आपके इस कथन से जाहिर है // आप जैसे कद के शायर से अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं // सर्वथा निर्मूल है , मै अभी गज़ल के मामले मे बच्चा ही हूँ , और यही मान कर आप मुझे सिखायें और उम्मीदें रखे , ऐसी मेरी आपसे प्रार्थना है । मेरी कुल उम्र अभी तीन साल ही मान कर चलियेगा ...
आपका पुनः गज़ल पर उपस्थित होने के लिये आभार ।
आदरनीया राजेश जी , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ।
आदरनीय नीलेश भाई , सराहना और सलाह के लिये आभार आपका । आवश्यक सुधार कर लूँगा ।
आदरनीय शिज्जु भाई , आभार आपका ,
प्रवास मे होने के कारण देरे से उपस्थित हो पाया ।
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