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ग़ज़ल -सुखवनर से वो पहले आदमी है - ( गिरिराज )

1222    1222     122 

सुखनवर से वो पहले आदमी है

गलत क्या है अगर नीयत बुरी है

 

किताबों से कमाई कम हुई तो   

सुना है, रूह उसने बेच दी है  

 

अचानक आइने के बर हुये हैं

इसी कारण बदन में झुरझुरी है

 

लगावट खून से, होती है अंधी

वो काला भी, हरा ही देखती है

 

चली तो है पहाड़ों से नदी पर

सियासी बांध रस्ता रोकती है

 

दिवारें लाख मज़हब की उठा लें

अगर बैठी, तो कोयल , कूकती है  

 

किसी से प्यार हो, या मुझसे नफरत

हक़ीकत है, कि कुतिया भूँकती है

********************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

 

 

 

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Comment by Sushil Sarna on February 26, 2017 at 12:15pm

चली तो है पहाड़ों से नदी पर
सियासी बांध रस्ता रोकती है

आदरणीय गिरिराज जी बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है .... हर शेर पे वाह निकलती है ... दिल से मुबारक बाद कबूल फरमाएं सर।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on February 24, 2017 at 10:31pm
आदरणीय
दीवारें लाख मजहब की उठा लें
अगर बैठी तो कोयल कूकती है
शेर में शुतुर गरबा का दोष है। क्योंकि भविष्य की बात शेर में की जा रही है इसलिये कोयल कूकेगी न कि कूकती है।
Comment by Ravi Shukla on February 24, 2017 at 4:47pm
आदरणीय गिरिराज भाई जी आपकी ग़ज़ल
मानी खेज हुई है हर शेर उम्दा है दिली दाद हाज़िर है
Comment by Mohammed Arif on February 23, 2017 at 5:33pm
आदरणीय गिरिराज जी आदाब, हर शे'र शानदार । मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
Comment by gaurav kumar pandey on February 23, 2017 at 11:55am
बहुत सुंदर ग़ज़ल हुई है वाह वाह
आदरणीय

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 23, 2017 at 10:07am

आदरणीय मित्रों ,

दिवारें लाख मज़हब की उठा लें

अगर बैठेगी कोयल , कूकती है   ....  इस शे र को कृपया  निम्न अनुसार पढें --

दिवारें लाख मज़हब की उठा लें

अगर बैठी, तो कोयल , कूकती है   ---  सादर निवेदन।

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