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किसे ये सब समझाऊँ .... स्त्री की ज़िंदगी का एक पहलू // डॉ० प्राची

रात सिसकती सुबह सुलगती, है जीवन का लेख
दर्द भरा सागर आँखों में, कौन सका है देख ?
कहाँ मैं अश्रु बहाऊँ ?
किसे मैं व्यथा सुनाऊँ ?

बेटी थी जिस घर की उसने छीन लिए अधिकार
हक़ माँगा तो रिश्तों में पहुँचेगी बड़ी दरार !
क्या बोलूँ ? किससे बोलूँ ? समझेगा मुझको कौन ?
अपने हक़ की बात करूँ या रह जाऊँ फिर मौन ?
कौन सा क़दम उठाऊँ ?
कभी ये समझ न पाऊँ !!!

कठपुतली सा नाच नचाती है मुझको ससुराल
घर की लक्ष्मी का दासी से भी बद्तर है हाल,
जितना सहती हूँ बढ़ते हैं उतने अत्याचार
छीन लिए सबने मुझसे मेरे सारे अधिकार ,
मदद को किसे बुलाऊँ ?
कहाँ आवाज़ उठाऊँ ?

जब तक सबकी हर इच्छा का रखती हूँ मैं ध्यान
बस तब तक ही मेरे घर में है मेरा स्थान ,
हाय! बेबसी मेरी, सहने हैं मुझको अन्याय
ना ज़मीन ना घर है मेरा ना है कोई आय ,
घुटन ही सहती जाऊँ ?
कहीं ना मैं मर जाऊँ ?

जिस आँगन पर जीवन वारा, कब छूटे वो द्वार
कब बेघर हो जाऊँ डर लगता है कितनी बार ,
बस धरती का एक किनारा होता मेरे नाम
उस पर बुनकर एक घरौंदा मन पाता आराम ,
टूट कर बिखर न जाऊँ ?
कहाँ मैं स्वप्न सजाऊँ ?

यदि ज़मीन औ' घर का टुकड़ा होता मेरे नाम
कभी आत्म-सम्मान नहीं होने देती नीलाम ,
मैं भी अपने निर्णय लेती, कहती अपनी बात
तब मुझको कैसे मेरे अपने देते आघात ,
बदल पर कुछ ना पाऊँ ?
किसे ये सब समझाऊँ ?


मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Dr.Prachi Singh on March 7, 2017 at 10:41am
गीत की भावदशा पर आपके अनुमोदन के लिए धन्यवाद आ० मोहम्मद आरिफ़ जी

समय के साथ स्त्रियों की दशा बदल ज़रूर रही है, लेकिन क्या आप जानते हैं दुनिया में और भारत में आधी आबादी के नाम कितनी ज़मीन है ? उन महिलाओं की सोचिये जो सचमुच इस पीड़ा से गुज़रती हैं दिन रात.. किसी अनहोनी में जो सपने पति को खो देती हैं और फिर कोई आसरा नहींरहता अचानक... क्या वो मायकों पर बोझ सी नहीं जीतीं, कितने राजस्थान हरियाणा के गाँव हैं जहाँ ये औरए अपने भाई के खेतों में ही बंधुआ मज़दूर बन कर रह जाती हैं , या फिर तलाक़ का दंश झेलने को विवश स्त्रियाँ क्या इस पीड़ा से अछूती रहती हैं ,
ये गीत LANDESA इंटेरनेशनल एन जो ओ के विशेष आग्रह पर महिलाओं के ज़मीन पर अधिकार के सम्बंध में लिखा गया है।
Comment by Mohammed Arif on March 7, 2017 at 10:29am
आदरणीया प्राची सिंह जी आदाब, नारी की बेबसी, लाचारी और समझौतावादी दृष्टिकोण को आपने बख़ूबी उकेरा है । वैसे सच कहूँ तो आज की नारियाँ इतनी लाचार नहीं है, सक्षम है सबल है और अपने अधिकारों के लिए जूझ रही है । बहुत-बहुत बधाई आपको और महिला दिवस की शुभ-कामनाएँ ।

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