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पक्का अबीर उसने तन-मन पर डाल दिया..... होली की असीम शुभकामनाओं के साथ एक नवगीत // डॉ० प्राची

कुछ मचल-मचल

कुछ सम्हल-सम्हल

सब रंग लुटाने आया फागुन का छलिया...

 

घोल हवा में मस्ती की लहराती धुन,

गीत मिलन के मीठे से गाता गुनगुन,

मुस्काता आँखों में भर कर शैतानी,

मैं हारी ! चलने दी उसकी मनमानी,

 

गुपचुप-गुपचुप 

लुकछुप-लकछुप 

फिर रास रचाने आया नटखट सा रसिया...

 

सोये सपनों की खिड़की पर दे दस्तक,

नेह ठिठोली के माँगे वो सारे हक़,

मुट्ठी में भींचे रंगों को छितराकर,

ठिठकी सी मुस्कानें इतरा दीं हँसकर,

 

लहकी-लहकी 

बहकी-बहकी 

मनरंगी अरमानों की लाया चूनरिया..

 

लाल-गुलाबी रिश्तों का ताना-बाना,

जाने कब बुन बैठा शातिर अनजाना,

लाख छुटाऊँ मगर रंग ना छूटेंगे,

इस बंधन के धागे अब ना टूटेंगे

 

दीवाना कर

मस्ताना कर

पक्का अबीर उसने तन-मन पर डाल दिया...

मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Samar kabeer on March 14, 2017 at 6:13pm
मोहतरमा डॉ.प्राची सिंह साहिबा आदाब,वधिया नवगीत लिखा आपने बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 14, 2017 at 11:15am
आदरणीया होली के शुभ अवसर पर इस बेहतरीन नवगीत की सौगात से चार चाँद लग गए आपको भी ढेर सारी शुभकामनाएं सादर
Comment by Mohammed Arif on March 13, 2017 at 1:56pm
आदरणीया प्राची सिंह जी आदाब, होली के रंगों से रंगीन रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई और होली की शुभकामनाएँ ।

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