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मन में रोंपा है हमने तो केवल केसर ..... नवगीत //प्राची

सौंधा-सौंधा
चहका-चहका
मन में रोंपा है हमने तो
केवल केसर...

बन फुहार कुछ तुम भी बरसो
ख़ुद को आज तरल होने दो,
उहापोह अब छोड़ो सारी
ख़ुद को ज़रा सरल होने दो,

गुमसुम पल बस प्यार भरी इक
आहट से ही खिल जाएँगे,
प्रश्न सदा जो रहे निरुत्तर
उनके भी हल मिल जाएँगे,

कठिन कहाँ है
मन को छूना ?
छू लोगे तो, रंग न छूटेगा
जीवन भर...

सूखा भावों का दरिया तो
जीवन होगा मरुधर जैसा,
फिर बबूल औ' नगफनी का
बंधन होगा आखिर कैसा?

मत जमने देना भावों को
लहर-लहर बस बहने देना,
होंठ अगर ख़ामोशी ओढ़ें
तो आँखों को कहने देना,

इक दूजे से
नज़र फेर कर
चल देते हैं, भूल यहीं करते हैं
अक्सर...

डॉ० प्राची सिंह
(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Dr.Prachi Singh on April 26, 2017 at 2:32pm

गीत पर आपकी सराहना के लिए आप सब का शुक्रिया 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 31, 2017 at 8:42pm
वाह आदरणीया सुन्दरतम भाव रचना..
Comment by Mohammed Arif on March 29, 2017 at 6:56pm
आदरणीया प्राची सिंह जी आदाब, प्रेम के रंग में सराबोर इस गीत के लिए आपको ढेरों बधाईयाँ । प्रेम ही संसार में शाश्वत मूल्य और विद्रोह के स्वर को झेलते सदियों से आगे बढ़ता रहा है और बढ़ता रहेगा ।

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