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कोई फकीर तो कोई बादशा नजर आये

बहर:-1212-1122-1212-22

कोई फ़क़ीर तो कोई बादशा नजर आये।।
नजर का फर्क है ये किसको क्या नजर आये।।

है चाह दिल में की मुझको वफ़ा नजर आये।।
लिबास गुल में भी अदबी हया नजर आये।।

उन्हें जो देख लु तो जख्म दिल हरा हो ले ।
वो इश्क राह में इक हादसा नजर आये।।

भटक गया हूँ मै इस जिन्दगी की उलझन में।
है फ़िक्रे दिल की कोई रास्ता नजर आये।।

वो मश्खरे में भी भददी जुबाँ नही होता ।
जिन्हें वजूद में अपने खुदा नजर आये।।

सवाल करते हो तुमसब अलग अलग कैसे ।
हो एक बात तो कोई मशविरा नजर आये।।

ये आपका है नजर से नजर मिला लेना ।
हमें तो आप ही कुछ इश्किया नजर आये।।

सफ़र सफ़र है सफ़र में ख़याल मंजिल रख ।
सफ़र से भटके जो वो कहकशा नजर आये।।

मौलिक/अप्रकाशित
आमोद बिन्दौरी

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Comment by Samar kabeer on March 27, 2017 at 11:13am
जनाब अमोद जी आदाब,ग्गज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई
ग़ज़ल अभी बहुत समय चाहती है ,
मतले के ऊला मिसरे में क़ाफ़िया दोष भी है और बह्र के लिहाज़ से 'तो',शब्द बढ़ रहा है,देखियेगा ।
तीसरे शैर के ऊला मिसरे में 'लु'को "लूँ" कर लें ।
4थे शैर के सानी मिसरे में 'फ़िक्रे'शब्द में इज़ाफ़त की ज़रूरत नहीं,उसे "फ़िक्र" कर लें ।

'वो मश्खरे में भी भद्दी ज़बाँ नहीं होता
जिन्हें वजूद में अपने ख़ुदा नज़र आये'
सानी मिसरा अच्छा है,लेकिन ऊला मिसरा सानी से रब्त पैदा नहीं कर पाया,ऊला में "मश्खरे"शब्द का क्या अर्थ है ?

'हो एक बात तो कोई मश्विरा नज़र आये'
ये मिसरा बह्र में नहीं है 'तो'शब्द निकाल दें तो ठीक हो जायेगा ।
सातवें शैर में मफ़हूम साफ़ नहीं है ।
आख़री शैर में क़ाफ़िया दोष है 'कहकशाँ',देखियेगा ।
Comment by Mohammed Arif on March 25, 2017 at 10:57pm
आदरणीय आमोद जी आदाब, बहुत अच्छी ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद कु़बूल कीजिए । ग़ज़ल के मतले के उला शेर म़ें आपने "बादशा"शब्द का इस्तेमाल किया है जबकि सही शब्द "बादशाह'"होता है । बाक़ी गुणीजन आपनी राय देंगे । शुक्रिया ।

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