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इश्क की दास्ताँ यह छुपानी नही (गजल)

बहर:- 212-212-212-212

फर्ज के वास्ते बद-जुबानी नही ।
फर्ज वो राह है जिसके मानी नही ।।

हिज्र से बढ़के कोई कहानी नही।।
इश्क की दास्ताँ यह,छुपानी नही ।।

रूठ कर आप ने ही तो रुसवा किया।
आप ने ही मेरी बात मानी नही।।

शोर-ओ- गुल मे बसर हो गई जिंदगी ।
यूं लगे हम ने पाई जवानी नही।।

उम्र का हर तजुर्बा गरल दे रहा ।
इतना जहरीला अश्को का पानी नही ।।

जानलेवा रहा जिंदगी का सफ़र ।
हर कदम मौत है जिंदगानी नही।।

एक दिन कान में छुपके से बोला कोई ।
तुमभी ढलने लगे अब जवानी नही ।।

एक तो मै कभी कुछ भी लिखता नही ।
गर उठा लू कलम कोई सानी नही ।।


मौलिक/ अप्रकाशित
अमोद बिन्दौरी ..

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Comment

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Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 25, 2017 at 7:18pm
आ गिरिराज दादा मैंने म'आनी को ममानी लिख दिया था यदि गलत है तो
आप का दिया गया सुझाव अच्छा लगा
सादर नमन
Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 25, 2017 at 7:15pm
आ समर सर तकाबुल ए रदीफ़ सर यहाँ तक पहुचा नही हूँ अभी सिर्फ शब्द बहर में रख अपनी बात कह्न की कक्षा में हूँ आगे प्रयाश कर रहा हैं मुझे मार्गदर्शन देते रहें

सादर नमन
Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 25, 2017 at 7:12pm
आप सभी दोस्तों का आभार नमन
आ समर सर प्रणाम
आप सभी के उतसाह वर्धन और मार्गदर्शन के लिए बहुत बहुत आभार
Comment by Mahendra Kumar on March 8, 2017 at 9:11pm
आदरणीय अमोद जी, इस प्रयास के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकार कीजिए और गुणीजनों की बातों पर ध्यान दीजिए। शुभक्मनाएँ। सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 8, 2017 at 8:18pm

आदरणीय आमोद भाई , ग़ज़ल पर अच्छा प्रयास हुआ है , गुणि जन की बातों का ख्याल कीजिये ।

मतला अगर ऐसे कह लें तो राबता दोनो मिसरों  हो जाय --

फर्ज के वास्ते बद-जुबानी नहीं ।
फर्ज की राह का कोई सानी नहीं

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 8, 2017 at 8:19am

नही को नहीं कीजिये और समर सर की बातों को आत्मसात कीजिये 
आप के उज्जवल भविष्य की कामना सहित ....
सादर 

Comment by रामबली गुप्ता on March 8, 2017 at 6:39am
अच्छा प्रयास है भाई आमोद जी बधाई स्वीकारें। समर भाई साहब के सुझावों पर ध्यान दीजियेगा।सादर
Comment by नाथ सोनांचली on March 7, 2017 at 3:19pm
आद0 आमोद श्रीवास्तव जी सादर अभिवादन। जैसा कि आपने लिखा है कि आप अभ ग़ज़ल लिखने की कला सीख रहे हैं उस लिहाज से आपकी अच्छी पकड़ हैं। शेष जैसा उस्ताद समर कबीर साहब सुझाये है, वैसा लिखिए, और ग़ज़ल पर समय दीजिये, मेरी आपको अनन्त शुभकामनाये। मैं भी आपकी श्रेणी में ही हूँ।
Comment by Samar kabeer on March 7, 2017 at 3:08pm
जनाब अमोद बिन्दोरी साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें,लेकिन ग़ज़ल अभी और समय चाहती है ।
मतले के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,दूसरी बात सानी मिसरे में ऐब-तनाफ़ुर भी है'राह है'तीसरी बात सानी मिसरे में आप फ़र्ज़ की राह को बेमानी बता रहे हैं,ये सही नहीं ।
'उम्र का हर तजुर्बा गरल दे रहा'
इस मिसरे में सही शब्द है "तज्रिबा"
'एक दिन कान में छुपके से बोला कोई'
ये मिसरा बेबह्र है ।
आख़री शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ का दोष है,देखियेगा ।
Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 7, 2017 at 12:14pm
आ मोहम्मद आरिफ साहब जी उत्साह वर्धन के लिए आप का बहुत बहुत आभार । सर अभी गजल लिखना सीख रहे हैं और हिंदी की उर्दू की भी कोई विशेस जानकारी नही है हमें तो इस गलती की क्षमा प्रार्थी है ।कोशिस कर रहे हैं की सही लिख्खे ........

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