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न पूछता है.. कोई आज यूँ पता मेरा/

बहर:- 1212-1122-1212-22


मेरे अतीत मेँ जाकर के जिन्दगी मुझसे॥
क्योँ चाहती हो मेरा प्यार,दोस्ती मुझसे॥

न पूछता है.. कोई आज यूँ पता मेरा॥
तमाम शहर मेँ इक तुम हो अजनबी मुझसे॥

बुझा चिराग हूँ, आखिर मजार सूनी है।
मेरी हयात न पूछो ये मुफलिसी मुझसे॥

जो तिनका तिनका सँजोए हैँ ख्वाब जीवन भर॥
क्योँ छीनते हैँ बडे लोग ये खुशी मुझसे॥

है ख्वाब दिल का मुहब्बत मेँ साथ होँ हम तुम।
इसे अतीत ने रख्खा है अजनबी मुझसे॥.

मौलिक /अप्रकाशित
आमोद बिँदौरी

Views: 431

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Comment by amod shrivastav (bindouri) on December 7, 2017 at 10:12am

 aa.   Samar kabeer  sir ji  सादर नमन  आभार

Comment by Samar kabeer on December 5, 2017 at 2:57pm

जनाब आमोद बिंदौरी जी आदाब,ग़ज़ल अभी बहुत समय  चाहती है ।

दूसरे शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है ,यही हाल तीसरे और चौथे शैर का भी है, बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by amod shrivastav (bindouri) on December 5, 2017 at 9:49am

आदरणीय  Mohammed Arif ji, Manoj kumar shrivastava सादर नमन

Comment by Mohammed Arif on December 5, 2017 at 8:06am

आदरणीय अमोद जी आदाब,

           ग़ज़ल का अच्छा प्रयास । उम्दा ग़ज़ल । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

Comment by Manoj kumar shrivastava on December 4, 2017 at 9:39pm

आदरणीय बिंदौरी जी सादर वन्दे! बहुत ही सुंदर रचना है। कोटिशः बधाइयाॅं स्वीकार करें।

कृपया ध्यान दे...

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