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ग़ज़ल -और हम भी प्यार की जागीर को समझे नहीं - ( गिरिराज )

2122    2122   2122   212

कट गये सर वो मगर शमशीर को समझे नहीं

घर जला, पर आग की तासीर को समझे नहीं

 

ख़्वाब ए आज़ादी कभी ताबीर तक पहुँचे भी क्यूँ 

सबको समझे वो मगर जंजीर को समझे नहीं

 

वो मुसव्विर पर सभी तुहमत लगाने लग गये  

जो उभरते मुल्क़ की तस्वीर को समझे नहीं

 

मजहबों में बाँट, वो नफरत दिलों में बो गये   

और हम भी उनकी इस तदबीर को समझे नहीं

 

उनका दावा है, वो चार: दर्द का करते रहे

हमको शिकवा है हमारी पीर को समझे नहीं

 

उनसे आँचल खींचने का कोई शिकवा क्या करे

कृष्ण की उँगली बंधी जो चीर को समझे नहीं

 

जब भी पहुँचे उस तरफ तो फूल से वो हो गये   

क्यूँ चलाते हो उसे, जिस तीर को समझे नहीं

 

कौन जाना है ख़ुदा को ? सारे दावे हैं गलत

है हक़ीक़त, हम अभी दिलगीर को समझे नहीं

********************************************
मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 11, 2017 at 11:52am

आदरणीय भाई गिरिराज जी, इस सुंदर गजल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 9, 2017 at 7:00am

आदरनीय महेंद्र भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 9, 2017 at 6:59am

आदरनीय सुशील भाई , आपका तहे दिल से शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 9, 2017 at 6:59am

आदरनीय रवि भाई , आपका ह्र्दय से आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 9, 2017 at 6:58am

आदरनीय यमित भाई , उत्साह वर्धन के लिये आभार आपका


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 9, 2017 at 6:58am

आ. नीलेश भाई , सराहना और सलाह के लिये आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 9, 2017 at 6:57am

आदरणीय आशीष भाई , सराहना के लिये आभार आपका


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 9, 2017 at 6:57am

आदरणीया राजेश जी , आपका हृदय से आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 9, 2017 at 6:56am

आदरणीय अनुराग भाई , आपका बहुत आभार ।

Comment by Samar kabeer on April 7, 2017 at 10:15pm
मेरे कहे को मान देने के लिये धन्यवाद ।

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