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क़दम उठाने से पहले विचार करना था

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन

(आख़री शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ नज़र अंदाज़ करें और शैर का लुत्फ़ लें)

अगर वफ़ा का चलन इख़्तियार करना था
क़दम उठाने से पहले विचार करना था

ये एक बार नहीं बार बार करना था
बग़ैर नाव के दरिया को पार करना था

हुसूल-ए-इल्म की ख़ातिर भटकते फिरते हैं
ग़ज़ल का फ़न जो हमें बा वक़ार करना था

उठाके बोझ ज़माने का तेरी चाहत में
शऊर-ओ-फ़िक्र की सरहद को पार करना था

वो मेरी तेग़ से मरता तो क्या मज़ा आता
उसी के तीर से उसका शिकार करना था

__________

हुसूल-ए-इल्म :- ज्ञान प्राप्त करना
शऊर :- अक़्ल
तेग़ :- तलवार

--समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on July 9, 2017 at 11:55pm
जनाब नवीन जी आदाब, सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on July 9, 2017 at 8:41pm
वाह सर क्या खूब लिखा । लाजबाब ग़ज़ल हुई । बधाई आपको ।
Comment by Samar kabeer on June 26, 2017 at 5:58am
जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 26, 2017 at 5:55am
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by vijay nikore on June 24, 2017 at 11:19am

//उठाके बोझ ज़माने का तेरी चाहत में
शऊर-ओ-फ़िक्र की सरहद को पार करना था

वो मेरी तेग़ से मरता तो क्या मज़ा आता
उसी के तीर से उसका शिकार करना था//

सभी शेर बहुत अच्छे हैं, और यह और भी मन-पसंद हैं। दिल से बधाई, समर जी।

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 14, 2017 at 10:45am
वाह वाह बहुत खूब सर ।
Comment by Samar kabeer on May 15, 2017 at 5:48pm
जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Mahendra Kumar on May 15, 2017 at 10:45am

हमसे पूछो कि ग़ज़ल मांगती है कितना लहू

सब समझते है ये धन्‍धा बड़े आराम का है

-राहत इन्दौरी 

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है,ग़ज़ल का फ़न क्या
चन्द लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाये

-जाँ निसार अख़्तर

लोग आसान समझते हैं ग़ज़ल गोई को
दिल का शीराज़ा बिखरता है ग़ज़ल कहने में

-नरेश कुमार शाद

हुसूल-ए-इल्म की ख़ातिर भटकते फिरते हैं
ग़ज़ल का फ़न जो हमें बा वक़ार करना था

-समर कबीर 

वाह! यह सिर्फ ओबीओ पर ही संभव है. जय-जय. 

Comment by Mahendra Kumar on May 15, 2017 at 10:28am

//ये एक बार नहीं बार बार करना था, बग़ैर नाव के दरिया को पार करना था// वाह! क्या ख़ूब शेर कहा है आपने आदरणीय समर कबीर सर. इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई प्रेषित है. सादर. 

Comment by Samar kabeer on May 12, 2017 at 5:53pm
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिबा आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

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