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ग़ज़ल नूर की- नुमायाँ है तू अपनी गुफ़्तार में,

122/122/122/12 
.
नुमायाँ है तू अपनी गुफ़्तार में,
सफ़ाई न दे हम को बेकार में.
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फ़क़त एक मिसरे में गीता सुनो
है संसार मुझ में, मैं संसार में.
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ये तामीर-ए-क़ुदरत भी कुछ कम नहीं
हिफ़ाज़त से रक्खा है गुल, ख़ार में.
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कहानी को अंजाम होने तो दो
सभी लौट आयेंगे किरदार में.
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ऐ ज़िल्ल-ए-ईलाही!! ये इन्साफ़ हो,
कि चुनवा दो शैख़ू को दीवार में.
.
तू शिद्दत से माथा पटक कर तो देख
कोई दर निकल आये दीवार में.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 13, 2017 at 11:23am

आभार  आ. शिज्जू भाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 13, 2017 at 11:16am

हमेशा की तरह आपका अंदाज़ बेहतर है आ. निलेश भाई बहुत बहुत बधाई इस मुरस्सा ग़ज़ल के लिए

कृपया ध्यान दे...

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