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ग़ज़ल नूर की- किसे गुरेज़ जो दो-चार झूठ बोले है,

१२१२/११२२/१२१२/२२ (११२)
.
किसे गुरेज़ जो दो-चार झूठ बोले है,
मगर वो शख्स लगातार झूठ बोले है.
.
चली भी आ कि तुझे पार मैं लगा दूँगी, 
हमारी नाव से मँझधार झूठ बोले है.
.
सवाल-ए-वस्ल पे करना यूँ हर दफ़ा इन्कार 
ज़रूर मुझ से मेरा यार झूठ बोले है.
.
कहानी ख़ूब लिखी है ख़ुदा ने दुनिया की,
कि इस में जो भी है किरदार, झूठ बोले है. 
.
पटकना रूह का ज़िन्दान-ए-जिस्म में माथा,
बिख़रना तय है प् दीवार झूठ बोले है.   
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 25, 2018 at 8:04am

आभार आ. बृजेश जी 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 28, 2017 at 6:03pm
चलिए शंका निवारण हुआ..सादर नमन
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 25, 2017 at 12:29pm

शुक्रिया आ. डॉ आशुतोष जी 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 25, 2017 at 9:10am
इस उम्दा ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई आदरणीय नीलेश भाई जी सादर
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 24, 2017 at 9:31pm

शुक्रिया आ. ब्रिजेश जी,
यहाँ बात एक शख्स की हो रही है न कि झूठ की संख्या की अत: हैं नहीं है ही आएगा 
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 24, 2017 at 9:30pm

शुक्रिया आ. अनुराग जी 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 24, 2017 at 8:04pm
आदरणीय नीलेश जी एक और शानदार ग़ज़ल..सादर नमन करते हुए उत्सुकतावश पुंछ रहा हूँ..मतले की पहली पंक्ति में दो चार झूट बोले है या बोले हैं होना चाहिए..या शायद उस इंसान की बात हो रही जो झूट बोले है..
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 22, 2017 at 9:18pm

शुक्रिया आ. समर सर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 22, 2017 at 9:18pm

शुक्रिया आ. सुरेन्द्रनाथ जी 

Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 3:01pm
जनाब निलेश'नूर'साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
25 मई से रमज़ान के कारण मंच से एक महीने की छुट्टी ले रहा हूँ,आपके माध्यम से ये जानकारी मंच के साथियों तक पहुंचा रहा हूँ ।

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