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1222 1222 122
अना की बात में कुछ दम नहीं है ।
कहा किसने तेरा परचम नहीं है ।।

मिलेंगी कब तलक ये स्याह रातें ।
मेरी किस्मत में क्या पूनम नही है ।।

अभी तक मुन्तजिर है आंख उसकी ।
वफ़ा के नाम पर कुछ कम नहीं है ।।

चिरागे इश्क़ पर है नाज़ उसको ।
उजाला भी कहीं मध्यम नहीं है ।।

सजा देंगे हमे ये हुस्न वाले ।
हमारे हक़ का ये फोरम नहीँ है ।।

तेरी जुल्फों की मैं तश्वीर रख लूँ।
मगर मुद्दत से इक अल्बम नही है ।।

मिरे घर आ गयी हैं भूल से वह । मिरे घर आज फिर बेगम नहीं हैं ।।

समझदारी बड़ी कच्ची है साहब ।
ये व्हिस्की है ये कोई रम नही है ।।

मिटा बैठा है वो उल्फ़त में हस्ती ।
उसे बर्बादियों का गम नहीं है ।।

अनासिर से मुकम्मल है बदन वो । कहा कसने बदन संगम नहीं है ।।

सँभल के चल जमाने की नज़र से । अभी घर पर तेरा बालम नहीं है ।।

अभी तक प्यार का मौसम नहीं है । तुम्हारी तिश्नगी में दम नहीं है ।।

बरसती रात का सच है बयां सब । तेरे चेहरे पे वो शबनम नहीं है ।।

सहर को मान लूँ मैं सच भी कैसे । गुलों पर रात की शबनम नहीं है ।।

अना के साथ मत यूँ पेश आओ।
मेरी ग़ज़लों का तू उदगम नहीं है ।।

मुहब्बत जीत जाएगी तुम्हारी ।
छुपा कोई यहाँ रुस्तम नहीं है ।।

है गर जज़्बा तो मेरे पास आओ ।
जिगर तक रास्ता दुर्गम नहीं है ।।

किसी का जख़्म मत पूछा करो यूँ ।
तुम्हारे पास जब मरहम नहीं है ।।

अजब क़ातिल से उसका वास्ता है ।
सजाये मौत पर मातम नही है ।।

----नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on May 24, 2017 at 1:42am
आ0 कबीर सर और आ0 गिरिराज सर बीच मे एक शेर ऐसा गया जो मतले की तरह था । मैंने कुछ अनावश्यक शेर हटा कर ग़ज़ल में संसोधन किया है अब नई ग़ज़ल यह होगी ।

1222 1222 122
अना की बात में कुछ दम नहीं है ।
कहा किसने तेरा परचम नहीं है ।।

मिलेंगी कब तलक ये स्याह रातें ।
तेरी किस्मत में क्या पूनम नही है ।।

अभी तक मुन्तजिर है आंख उसकी ।
वफ़ा के नाम पर कुछ कम नहीं है ।।

चिरागे इश्क़ पर है नाज़ उसको ।
उजाला भी कहीं मध्यम नहीं है ।।

सजा देंगे हमे ये हुस्न वाले ।
हमारे हक़ का ये फोरम नहीँ है ।।

तेरी जुल्फों की मैं तश्वीर रख लूँ।
मगर मुद्दत से इक अल्बम नही है ।।

मिटा बैठा है वो उल्फ़त में हस्ती ।
उसे बर्बादियों का गम नहीं है ।।

अनासिर से मुकम्मल है बदन वो ।
कहा कसने बदन संगम नहीं है ।।

नहीं है वस्ल का मौसम कहो मत ।
तुम्हारी तिश्नगी में दम नहीं है ।।

सहर को मान लूँ मैं सच भी कैसे ।
गुलों पर रात की शबनम नहीं है ।।

अना के साथ मत यूँ पेश आओ।
मेरी ग़ज़लों का तू उदगम नहीं है ।।

बहुत मुमकिन मुहब्बत जीत जाए ।
छुपा कोई वहाँ रुस्तम नहीं है ।।

है गर जज़्बा तो मेरे पास आओ ।
जिगर तक रास्ता दुर्गम नहीं है ।।

किसी का जख़्म मत पूछा करो यूँ ।
तुम्हारे पास जब मरहम नहीं है ।।

अजब क़ातिल से उसका वास्ता है ।
सजाये मौत पर मातम नही है ।।

----नवीन मणि त्रिपाठी
Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 3:14pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,आपने एक साथ दो ग़ज़लें पोस्ट कर दीं, 11वें शैर के बाद दूसरी ग़ज़ल शुरू हो गई है,ज़ियादा तर अशआर में क़ाफ़िया पैमाई के अलावा कुछ नहीं है,मैं जनाब गिरिराज भंडारी जी से सहमत हूँ,बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 21, 2017 at 2:13pm

आदरणीय नवीन भाई , अच्छी गज़ल कही है , हार्दिक बधाइयाँ ।  कुछ शेर जो आपकी समझ से कमज़ोर हों कम कर दीजिये .. मै भी सीखने वाला हूँ ... और कुछ कहने के लायक मै ख़ुद को नही समझता ।

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