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सबसे न बताओ के परेशान यही है ।
आशिक़ हूँ यकीनन मेरी पहचान यही है ।।

यूँ ही न् गले मिल तू जरा सोच समझ ले ।
इस शह्र के हालात पे फरमान यही है ।।

कहने लगी है आज से मुझको भी सरेआम ।
ठहरा है जो मुद्दत से वो मेहमान यही है ।।

बर्बाद गुलिस्तां को सितम गर ने किया जब।
लोगो ने कहा प्यार का तूफ़ान यही है ।

अक्सर ही नकाबों में छुपाते हैं ये चेहरा ।
बैठा जो तेरे हुस्न पे दरबान यही है ।।

लाती हैं हवाएं मेरे महबूब की खुशबू ।
शायद मेरी तक़दीर में बागान यही है।।

ठहरो किसी दीवाने को मुजरिम न् बनाओ ।
मिलता जो मुहब्बत से वो इंसान यही है ।।

मौलिक अप्रकाशित

नवीन मणि त्रिपाठी

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Comment by Mahendra Kumar on May 22, 2017 at 9:10am

आदरणीय नवीन जी, अच्छी ग़ज़ल है आपकी. हार्दिक बधाई प्रेषित है. सादर.

Comment by Ravi Shukla on May 18, 2017 at 2:29pm

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी  अच्छी ग़ज़ल ।  मुबारकबाद क़ुबूल करें

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 16, 2017 at 5:40pm
आ0मुहम्मद आरिफ साहब शुक्रिया ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on May 16, 2017 at 5:39pm
आ0 समर कबीर सर सादर नमन । आपके आदेश का अवश्य पालन होगा ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on May 16, 2017 at 5:38pm
आ0 सतविंद्र कुमार जी विशेष आभार ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on May 16, 2017 at 5:37pm
आदरणीय विजय निकोरे साहब आभार ।
Comment by vijay nikore on May 16, 2017 at 1:55pm

//ठहरो किसी दीवाने को मुजरिम न् बनाओ ।
मिलता जो मुहब्बत से वो इंसान यही है ।।//

वाह, वाह । बहुत खूब। अच्छी गज़ल के लिए बधाई।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on May 15, 2017 at 6:52pm
आदरणीय नवीन मणि जी हार्दिक बधाई स्वीकारें इस उम्दा गजल के लिए!
Comment by Samar kabeer on May 15, 2017 at 6:00pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
एक निवेदन ये है कि दूसरे रचनाकारों की रचनाओं पर अपनी बहुमूल्य टिप्पणी दिया करे तो बहतर होगा । आज कल तो ओबीओ पर कुछ पुराने सदस्यों को भी जब अपनी ग़ज़ल पोस्ट करना होती है तो दो चार रचनाओं पर अपनी सक्रियता दिखा देते हैं और फिर जब ग़ज़ल पर प्रतिक्रयाएँ आना बंद हो जाती हैं तो ग़ायब हो जाते हैं और फिर नई रचना के साथ आ जाते हैं ।उम्मीद है मेरे निवेदन को स्वीकार करेंगे ।
Comment by Mohammed Arif on May 15, 2017 at 5:47pm
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, बहुत अच्छी ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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