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Naveen Mani Tripathi's Blog (280)

ग़ज़ल



2122 2122 212

हुस्न का बेहतर नज़ारा चाहिए ।

कुछ तो जीने का सहारा चाहिए ।।

हो मुहब्बत का यहां पर श्री गणेश ।

आप का बस इक इशारा चाहिए ।।



हैं टिके रिश्ते सभी दौलत पे जब ।

आपको भी क्या गुजारा चाहिए ।।

है किसी तूफ़ान की आहट यहां ।

कश्तियों को अब किनारा चाहिए ।।

चाँद कायम रह सके जलवा तेरा ।

आसमा में हर सितारा चाहिए ।।

फर्ज उनका है तुम्हें वो काम दें ।

वोट जिनको भी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 19, 2019 at 1:12am — No Comments

ग़ज़ल

221 2121 1221 212

ता-उम्र उजालों का असर ढूढ़ता रहा ।

मैं तो सियाह शब में सहर ढूढ़ता रहा ।।

अक्सर उसे मिली हैं ये नाकामयाबियाँ ।

मंजिल का जो आसान सफ़र ढूढ़ता रहा ।।

मुझको मेरा मुकाम मयस्सर हुआ कहाँ ।

घर अपना तेरे दिल में उतर ढूढ़ता रहा ।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 16, 2019 at 1:10am — 1 Comment

ग़ज़ल- आरजू ही नहीं जब हुई मुख़्तसर

212 212 212 212

कीजिये मत अभी रोशनी मुख़्तसर ।

आदमी कर न ले जिंदगी मुख़्तसर ।।

इश्क़ में आपको ठोकरें क्या लगीं ।

दफ़अतन हो गयी बेख़ुदी मुख़्तसर ।।

नौजवां भूख से टूटता सा मिला ।

देखिए हो गयी आशिक़ी मुख़्तसर ।।

गलतियां बारहा कर वो कहने लगे ।

क्यूँ हुई मुल्क़ में नौकरी मुख़्तसर ।।

कैसे कह दूं के समझेंगे जज़्बात को ।

जब वो करते नहीं बात ही मुख़्तसर ।।

सिर्फ शिक़वे गिले में सहर हो गयी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 30, 2019 at 6:30pm — No Comments

ग़ज़ल - दिल मे भगवान का डर पैदा कर

2122 1122 22

आपने जुमलों में असर पैदा कर ।

कुछ तो जीने का हुनर पैदा कर ।।

दिल जलाने की अगर है ख्वाहिश ।

तू भी आंखों में शरर पैदा कर ।।

गर ज़रूरत है तुझे ख़िदमत की ।

मेरी बस्ती में नफ़र पैदा कर ।।

हर सदफ जिंदगी तो मांगेगी ।

इस तरह तू न गुहर पैदा कर ।।

देखता है वो तेरा जुल्मो सितम।

दिल में भगवान का डर पैदा कर ।।

अब तो सूरज से है तुझे खतरा…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 16, 2019 at 1:35pm — 4 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

फासले    बेकरार    करते   हैं ।

और   हम   इतंजार  करते   हैं ।।

इक तबस्सुम को लोग जाने क्यूँ ।

क़ातिलों में सुमार करते हैं ।।

सिर्फ धोखा मिला ज़माने से ।

जब कभी ऐतबार करते हैं ।।

मैं तो इज्ज़त बचा के चलता हूँ ।

और वह तार तार करते हैं ।।

उम्र गुज़री है बस चुकाने में ।

आप जब भी उधार करते हैं।।

उनको गफ़लत हुई यही यारो…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 15, 2019 at 3:47pm — 2 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 212

जब लबों पर वह तराना आ गया ।

याद फिर गुजरा ज़माना आ गया ।।

शब के आने की हुई जैसे खबर ।

जुगनुओं को जगमगाना आ गया ।।

मैकदे को शुक्रिया कुछ तो कहो।

अब तुम्हें पीना पिलाना आ गया ।।

वस्ल की इक रात जो मांगी यहां ।

फिर तेरा लहजा पुराना आ गया ।।

छोड़ जाता मैं तेरी महफ़िल मगर ।

बीच मे ये दोस्ताना आ गया ।।

जब भी गुज़रे हैं गली से वो मेरे ।

फिर तो…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 5, 2019 at 11:43pm — 3 Comments

ग़ज़ल

221 1222 22 221 1222 22

गुज़री है मेरे दिल पर क्या क्या अब हिज्र का आलम पूछ रहे ।।

मालूम तुम्हें जब गम है मेरा क्यूँ आंखों का पुरनम पूछ रहे ।।1

इक आग लगी है जब दिल में चहरे पे अजब सी बेचैनी ।

इकरारे मुहब्बत क्या होगी ये बात वो पैहम पूछ रहे ।।2

कुछ फ़र्ज़ अता कर दे जानां कुछ खास सवालातों पर अब ।

होठों पे तबस्सुम साथ लिए जो वस्ल का आगम पूछ रहे ।।3

हालात मुनासिब कौन कहे जलती है जमीं जलता भी है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 3, 2019 at 12:30am — 3 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 12

मुहब्बत की ख़ातिर ज़िगर कीजिये ।

अभी से न यूँ चश्मे तर कीजिये ।।

गुजारा तभी है चमन में हुजूऱ ।

हर इक ज़ुल्म को अपने सर कीजिये ।।

करेगी हक़ीक़त बयां जिंदगी ।

मेरे साथ कुछ दिन सफ़र कीजिये ।।

पहुँच जाऊं मैं रूह तक आपकी ।

ज़रा थोड़ी आसां डगर कीजिये ।।

वो पढ़ते हैं जब खत के हर हर्फ़ को ।

तो मज़मून क्यूँ मुख़्तसर कीजिए ।।

लगे मुन्तज़िर गर…

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Added by Naveen Mani Tripathi on April 12, 2019 at 10:34pm — 2 Comments

खैरमक़दम हमारा हुआ तो हुआ

212 212 212 212

ख़ैरमक़दम हमारा हुआ  तो हुआ ।

वार फिर. कातिलाना हुआ तो हुआ ।।

फर्क पड़ता कहाँ अब सियासत पे है ।

रिश्वतों पर खुलासा हुआ तो हुआ ।।

ये ज़रुरी था सच की फ़ज़ा के लिए ।

झूठ पर जुल्म ढाना हुआ तो हुआ ।।

आप आये यहाँ तीरगी खो गयी ।

मेरे घर में उजाला हुआ तो हुआ ।।

हिज्र के दौर में हम सँभलते रहे ।

आपके बिन गुजारा हुआ तो हुआ ।।



मुझको मालूम था…

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Added by Naveen Mani Tripathi on April 4, 2019 at 12:46pm — 8 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 122

वो मक़तल में कैसी फ़ज़ा माँगते हैं ।।

जो क़ातिल से उसकी अदा माँगते हैं ।।

जुनूने शलभ की हिमाकत तो देखो ।

चरागों से अपनी क़ज़ा माँगते हैं।।

उन्हें भी मिला रब सुना कुफ्र में है ।

जो अक्सर खुदा से जफ़ा माँगते हैं ।।

असर हो रहा क्या जमाने का उन पर ।

वो क्यूँ बारहा आईना माँगते हैं ।।

अजब कसमकश है मैं किससे कहूँ अब ।

यहां बेवफ़ा ही वफ़ा माँगते हैं…

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Added by Naveen Mani Tripathi on April 2, 2019 at 6:42pm — 8 Comments

ग़ज़ल

221, 2121, 1221, 212



दैरो हरम से दूर वो अंजान ही तो है ।

होंगी ही उससे गल्तियां इंसान ही तो है ।।

हमको तबाह करके तुझे क्या मिलेगा अब ।

आखिर हमारे पास क्या, ईमान ही तो है ।।

खुलकर जम्हूरियत ने ये अखबार से कहा ।

सारा फसाद आपका उन्वान ही तो है ।।

खोने लगा है शह्र का अम्नो सुकून अब ।

इंसां सियासतों से परेशान ही तो है ।।

उसने तुम्हें हिजाब में रक्खा है रात दिन ।

वह भी तुम्हारे हुस्न का दरबान ही तो है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 22, 2019 at 4:39pm — 2 Comments

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22



जब  मुलाकात में सौ बार  बहाना आया ।।

कैसे कह दूँ मैं तुझे प्यार निभाना आया ।।

क़ातिले इश्क़ का इल्ज़ाम लगा जब तुम पर ।

पैरवी करने यहां सारा ज़माना आया ।।

आज की शाम तेरी बज़्म में हंगामा है।

मुद्दतों बाद जो मौसम ये सुहाना आया ।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 19, 2019 at 1:09am — No Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

दरमियाँ    हुस्न    पर्दा    दारी   है ।

कैसे    कह   दूँ  के   बेक़रारी   है ।।

ऐ  कबूतर  जरा  सँभल   के  उड़ ।

देखता  अब   तुझे    शिकारी   है ।।

कौन  कहता  बहुत  ख़फ़ा  हैं  वो ।

आना  जाना  तो  उनका   जारी है ।।

सब   बताता   है   नूर   चेहरे   का ।

रात    उसने   कहाँ    गुजारी    है ।।

कैसे  कर  लूं …

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 10, 2019 at 9:00am — 5 Comments

यह खबर इज़्तिराब की सी है

2122 1212 22



यह ख़बर इज़्तिराब की सी है ।

बात जब इंकलाब की सी है ।।

वह बगावत पे आज उतरेगा ।

उसकी आदत नवाब की सी है ।।

हम सफ़र ढूढना बहुत मुश्किल ।

सोच जब इंतखाब की सी है ।।

देखकर जिसको बेख़ुदी में हूँ ।

उसकी फ़ितरत शराब की सी है ।।

आ रहे रात में सनम शायद ।

रोशनी आफ़ताब की सी है ।।

रोज पढ़ता हूँ उसको शिद्द्त से ।

वो जो मेरी किताब की सी है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 6, 2019 at 6:55pm — No Comments

ग़ज़ल



2122 1212 22

खूब सूरत गुनाह कर बैठे ।

हुस्न पर हम निगाह कर बैठे ।।

आप गुजरे गली से जब उनके ।

सारी बस्ती तबाह कर बैठे ।।

कुछ असर हो गया जमाने का ।

ज़ुल्फ़ वो भी सियाह कर बैठे ।।

देख कर जो गए थे गुलशन को ।

आज फूलों की चाह कर बैठे ।।

जख्म दिल का अभी हरा है क्या ।

आप फिर क्यों कराह कर बैठे ।।

किस तरह से जलाएं मेरा घर ।

लोग मुझसे सलाह कर बैठे ।।

लोग नफरत की इस सियासत…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 4, 2019 at 1:00pm — 11 Comments

ग़ज़ल

अब शहादत को न जाया कीजिये ।

आइना उनको दिखाया कीजिये।।

मुल्क में है इन्तकामी हौसला ।

हौसलों को मत दबाया कीजिये ।।

आग उगलेगी सुख़नवर की कलम ।

अब न कोई सच छुपाया कीजिये ।।

ख़ाब जो देखें हमारे कत्ल की ।

हर सितम उनपे ही ढाया कीजिये ।।

उनके हमले से फ़जीहत हो गयी।

दिल यहाँ अपना जलाया कीजिये ।।

तफ़सरा कीजै नये हालात पर ।

आप अपना घर बचाया कीजिये…

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Added by Naveen Mani Tripathi on February 24, 2019 at 8:39pm — 4 Comments

ग़ज़ल



1212  1122 1212 22/112

क़ज़ा का करके मेरी इंतिज़ाम उतरी है ।

अभी अभी जो मेरे घर मे शाम उतरी है ।।

तमाम  उम्र  का ले तामझाम उतरी है ।

ये जीस्त मौत को करने  सलाम उतरी है ।।

अदाएं देख के उसकी ये लग रहा है मुझे ।

कि लेने  हूर  कोई  इंतिकाम  उतरी है ।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on February 13, 2019 at 8:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222

फ़ना के बाद भी अपनी निशानी छोड़ आये हैं ।

जिसे तुम याद रक्खो वो कहानी छोड़ आए हैं ।।

सुकूँ मिलता हमें कैसे यहां परदेश में आकर ।

विलखती मां की आंखों में जो पानी छोड़ आये हैं ।।

कलेजा मुँह को आता है जरा माँ बाप से पूछो ।

जो घर से दूर जा बेटी सयानी छोड़ आये हैं ।।

हमें इंसाफ का उनसे तकाज़ा ही नहीं था कुछ ।

अदालत में तो हम भी हक़ बयानी छोड़ आये हैं ।l

तेरे प्रश्नों का उत्तर था तेरे लहजे में ही…

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Added by Naveen Mani Tripathi on February 11, 2019 at 12:55am — 3 Comments

ग़ज़ल



221 2121 1221 212

छलके जो उनकी आंख से जज़्बात ख़ुद ब ख़ुद ।

आए मेरी ज़ुबाँ पे सवालात ख़ुद ब  ख़ुद ।।

किस्मत खुदा ने ऐसी बनाई है सोच कर ।

मिलती गमों की हमको भी सौगात ख़ुद ब ख़ुद ।।

चर्चा  है  शह्र  में  उसी की  देख आज कल ।

बाँटा है जिसने इश्क़ को ख़ैरात ख़ुद ब ख़ुद ।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on February 1, 2019 at 3:01pm — 3 Comments

ग़ज़ल

1212     1122     1212      22

क़ज़ा के वास्ते ये इंतिज़ाम किसका है ।

तेरे  दयार  में  जीना  हराम किसका  है ।।

उसे है ख़ास ज़रूरत  जरा पता करिए ।

बड़े  सलीके  से  आया  सलाम किसका  है ।।

दिखे हैं रिन्द बहुत तिश्नगी के साथ वहाँ ।

कोई बताए गली में मुकाम किसका है ।।

है जीतना तो ख़यालात ऐब…

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Added by Naveen Mani Tripathi on January 21, 2019 at 8:30pm — 3 Comments

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