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Naveen Mani Tripathi's Blog (119)

ग़ज़ल पास रह गया मेरे है , आपका कलाम भी

*212 1212 1212 1212*



आपकी ही रहमतों से मिल गई वो शाम भी ।

कुछ अदा छलक उठी है कुछ नज़र से जाम भी ।।

---------------------------------------------------------------

ढूढ़िये न आप अब मेरे उसूल का चमन ।

दिल कभी जला यहां तो जल गया मुकाम भी ।।

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नज्र कर दिया गुलाब तो हुई नई ख़ता ।

हुस्न आपका बना गया उसे गुलाम भी ।

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जब चिराग… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 14, 2017 at 11:01pm — 6 Comments

उसी का तसव्वुर पढ़ा जा रहा है

एक लंबी ग़ज़ल 30 शेर के साथ



122 122 122 122

अगर आप में कुछ सलीका बचा है ।

तो फिर आप से भी मेरी इल्तिजा है ।।



रकीबों की महफ़िल में क्या क्या हुआ है ।

सुना आपका ही तो जलवा रहा है ।।



यूँ रुख़ को पलट कर चले जाने वाले ।

बता दीजिए क्या मुहब्बत ख़ता है ।।



हया को खुदा की अमानत जो समझे ।

उन्हें ही सुनाई गई क्यों सजा है ।।



अगर दिल में आये तो रहना भी सीखो ।

मेरी तिश्नगी का यही मशबरा है ।।



मुख़ालिफ़ हुई ये हवाएं चमन… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 14, 2017 at 10:30pm — 17 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

उस से मिलकर तुझे हुआ क्या है ।

पूछते लोग माजरा क्या है ।।



सच बताने पे आप क्यूँ रोये ।

आइने से हुई ख़ता क्या है ।।



है तबस्सुम का राज क्या उनके ।

आंख में गौर से पढा क्या है ।।



अश्क़ हैं बेहिसाब हिस्से में ।

ज़श्न के वास्ते बचा क्या है ।।



इस तरह रोकिये नहीं मुझको ।

पूछिये मत मेरा पता क्या है ।।



आप मतलब की बात करते हैं ।

आपके साथ फायदा क्या है ।।



छोड़िये बात आप भी उसकी ।

उसकी बातों में… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 11, 2017 at 9:00am — 13 Comments

वफ़ा के साथ यकीनन है वास्ता मेरा

1212 1122 1212 22

अलग है बात रखा नाम बेवफा मेरा ।।

वफ़ा के साथ यकीनन है वास्ता मेरा ।।



मेरे गुनाह का चर्चा है शह्र में काफी ।

तमाम लोग सुनाते हैं वाक्या मेरा ।।



नज़र नज़र से मिली और होश खो बैठा ।

उसे भी याद है उल्फत का हादसा मेरा ।।



वो आसुओं से भिगोते ही जा रहे दामन ।

पढा जो खत है अभी ,था वही लिखा मेरा ।



फ़िजा के पास रकीबों का हो गया पहरा ।

बढ़ा रही हैं हवाएं भी फ़ासला मेरा ।।



गरीब हूँ मैं शिकायत भी क्या करूँ उनकी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 5, 2017 at 9:23am — 4 Comments

ग़ज़ल - मिलते कहाँ हैं लोग भी होशो हवास में

221 2121 1221 212



ठहरी मिली है ज़िंदगी उनके गिलास में ।

मिलते कहाँ हैं लोग भी होशो हवास में ।।



देकर तमाम टैक्स नदारद है नौकरी ।

अमला लगा रखा है उन्होंने विकास में ।।



सरकार सियासत में निकम्मी कही गई ।

रहते गरीब लोग बहुत भूँख प्यास में ।।



बेकारियों के दौर गुजरा हूँ इस कदर ।

घोड़ा ही ढूढता रहा ताउम्र घास में ।।



यूँ ही तमाम कर लगे हैं जिंदगी पे आज ।

रहना हुआ मुहाल है अपने निवास में ।।



कितने नकाब डाल के मिलने… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 4, 2017 at 5:06pm — 13 Comments

ग़ज़ल

221 2121 1221 212



ठहरी मिली है ज़िंदगी उनके गिलास में ।

मिलते कहाँ हैं लोग भी होशो हवास में ।।



देकर तमाम टैक्स नदारद है नौकरी ।

अमला लगा रखा है उन्होंने विकास में ।।



सरकार सियासत में निकम्मी कही गई ।

रहते गरीब लोग बहुत भूँख प्यास में ।।



बेकारियों के दौर गुजरा हूँ इस कदर ।

घोड़ा ही ढूढता रहा ताउम्र घास में ।।



यूँ ही तमाम कर लगे हैं जिंदगी पे आज ।

रहना हुआ मुहाल है अपने निवास में ।।



कितने नकाब डाल के मिलने… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 4, 2017 at 3:38pm — 3 Comments

ग़ज़ल -- कीचड़ के आस पास में देखा कवँल गया

*221 2121 1221 212*



सारा चमन गुलाब था अश्कों में ढल गया ।

था बारिशों का दौर समंदर मचल गया ।।



रुसवाईयां तमाम थीं दिल में मलाल थे ।

देखा जो हुस्न आपका पत्थर पिघल गया ।।



खुशबू बनी हुई है अभी तक दयार में ।

महबूब मेरा ख्वाब में आकर टहल गया ।।



कैसा नशा था इश्क़ में मदहोशियों के बीच ।

जो भी थे दफ़्न राज़ वो पल में उगल गया।।



जब मैं जला तो लोग बहुत जश्न में मिले ।

जैसे किसी नसीब का सिक्का उछल गया ।।



कहता था है ये आग… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 23, 2017 at 2:00am — 4 Comments

ग़ज़ल - बेसबब यूँ ही नही परदा करो

2122 2122 212

इस तरह बे फिक्र मत निकला करो ।

कुछ ज़माने को भी अब समझा करो।।



लोग पलकें हैं बिछाए राह में ।

बेसबब यूँ ही नहीं परदा करो ।।



है मुहब्बत से सभी की दुश्मनी।

ज़ालिमों से मत कभी उलझा करो ।।



फिर सितारे टूटकर गिरते मिले ।

आसमा पर भी नज़र रक्खा करो ।।



कुछ परिंदे हो गए बेख़ौफ़ हैं ।

कौन कैसा उड़ रहा देखा करो ।।



दाग दामन पर लगे कितने यहां ।

आइनो से भी कभी पूछा करो ।।



वक्तपर अक्सर मुकर जाते हैं लोग… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 22, 2017 at 8:38am — 1 Comment

ग़ज़ल शाम होते ही सँवर जाएंगे

2122 1122 22

चाँद बनकर वो निखर जाएंगे ।

शाम होते ही सँवर जाएंगे ।।



जख्म परदे में ही रखना अच्छा ।

देखकर लोग सिहर जाएंगे ।।



छेड़िये मत वो कहानी मेरी।

दर्द मेरे भी उभर जाएंगे ।।



घूर कर देख रहे हैं क्या अब।

आप नजरों से उतर जाएंगे।।



वक्त रुकता नहीं है दुनिया में ।

दिन हमारे भी सुधर जाएंगे ।।



क्या पता था कि जुदा होते ही ।

इस तरह आप बिखर जाएंगे ।।



ये मुहब्बत है इबादत मेरी ।

एक दिन दिल मे ठहर में… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 19, 2017 at 1:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल

1222 1222 122

रकीबों को उठाया जा रहा है ।

किसी पर जुल्म ढाया जा रहा है ।।



मैं छोड़आया तुम्हारी सल्तनत को।

मगर चर्चा चलाया जा रहा है ।।



मुखौटे में मिले हैं यार सारे ।

नया चेहरा दिखाया जा रहा है।।



सुखनवर की किसी गंगा में देखा ।

नया सिक्का चलाया जा रहा है ।।



सही क्या है गलत क्या है ग़ज़ल में ।

नया कुछ इल्म लाया जा रहा है ।।



अदब से वास्ता जिसका नहीं था ।

उसे आलिम बताया जा रहा है ।।



सिकेंगी रोटियां अब… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 13, 2017 at 5:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल - जो मुद्दत से मुझे पहचानता है

1222 1222 122

मेरी पहचान को खारिज़ किया है ।

जो मुद्दत से मुझे पहचानता है ।।



खुशामद का हुनर बख्सा है रब ने ।

खुशामद से वो आगे बढ़ रहा है ।।



जतन कितना करोगे आप साहब ।

ये भ्रष्टाचार अब तक फल रहा है ।।



यकीं होता नही जिसको खुदा पर ।

वही इंसां खुदा से माँगता है ।।



उन्हें ही डस रहें हैं सांप अक्सर ।

जो सापों को घरों में पालता है ।।



गया मगरिब में देखो आज सूरज ।

पता वह चाँद का भी ढूढता है ।।



मदारी के लिए… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 12, 2017 at 1:58pm — 13 Comments

सियाह ज़ुल्फ़ के साये में शाम हो जाये

1212 1122 1212 22*

ये ख्वाहिशें हैं कि दिल तक मुकाम हो जाये ।

सियाह ज़ुल्फ़ के साये में शाम हो जाये ।।



हैं मुन्तज़िर सी ये आंखे कभी तू मिल तो सही।

नए रसूख़ पे मेरा कलाम हो जाये ।।





बड़े गुरुर से उसने उठाई है बोतल ।

ये मैकदा न कहीं फिर हराम हो जाये ।।



फिदा है आज तलक वो भी उस की सूरत पर ।

कहीं न वो भी सनम का गुलाम हो जाये ।।



अदा में तेज हुकूमत की ख्वाहिशें लेकर ।

खुदा करे कि वो दिल का निजाम हो जाए ।।





किसी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 9, 2017 at 1:30am — 9 Comments

रहमतों से फ़ासला हो जाएगा

मत कहो हमसे जुदा हो जाएगा ।

वह मुहब्बत में फ़ना हो जाएगा ।।





इश्क के इस दौर में दिल आपका ।

एक दिन मेरा पता हो जाएगा ।।



धड़कनो के दरमियाँ है जिंदगी ।

धड़कनो का सिलसिला हो जाएगा ।।



इस तरह उसने निभाई है कसम ।

वह हमारा देवता हो जाएगा ।।



ऐ दिले नादां न कर मजबूर तू ।

वो मेरी ज़िद पर ख़फ़ा होजाएगा ।।



पत्थरो को फेंक कर तुम देख लो ।

आब का ये कद बड़ा हो जाएगा ।।



मत निकलिए इस तरह बे पैरहन ।

फिर चमन में हादसा… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 6, 2017 at 11:49pm — 8 Comments

आप क्या हैं इसे जानता कौन है

212 212 212 212

पूछिये मत यहां गमज़दा कौन है ।

पूछिये मुद्दतों से हँसा कौन है ।।



वो तग़ाफ़ुल में रस्में अदा कर गया ।

कुछ खबर ही नहीं लापता कौन है ।



घर बुलाकर सनम ने बयां कर दिया ।

आप आ ही गये तो ख़फ़ा कौन है ।।



इस तरह कोई बदला है लहजा कहाँ ।

आपके साथ में रहनुमा कौन है ।।



आज तो बस सँवरने की हद हो गई ।

यह बता दीजिए आईना कौन है ।।



अश्क़ आंखों से छलका तो कहने लगे ।

ढल गई उम्र अब पूंछता कौन है ।।



यूँ भटकता… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 5, 2017 at 3:17pm — 12 Comments

धब्बा लगा रहा है कोई आफ़ताब में

221 2121 1221 212



आ जाइये हुजूर जरा फिर हिजाब में ।

लगती बुरी नजर है यहां माहताब में ।।



बच्चों की लाश पर है तमाशा जनाब का ।

औलाद खो रहे किसी खानाखराब में ।।



अंदाज आपके हैं बदलते अना के साथ ।

शायद कोई नशा है यहां इंकलाब में ।।



सत्ता मिली जो आपको चलने लगे हैं दौर ।

डूबे मिले हैं आप भी महंगी शराब में ।।



खामोशियों के बीच जफा फिर जवाँ हुई ।

आंखों ने अर्ज कर दिया लुब्बे लुआब में ।।



यूँ ही किया था जुर्म वो दौलत… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 1, 2017 at 11:06pm — 20 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

वो तेरा छत पर बुलाकर रूठ जाना फिर कहाँ ।

वस्ल के एहसास पर नज़रें चुराना फिर कहाँ ।।



कुछ ग़ज़ल में थी कशिश कुछ आपकी आवाज थी ।

पूछता ही रह गया अगला तराना फिर कहाँ ।।



आरजू के दरमियाँ घायल न हो जाये हया ।

अब हया के वास्ते पर्दा गिराना फिर कहाँ ।।



कातिलाना वार करती वो अदा भूली नहीं ।

शह्र में चर्चा बहुत थी अब निशाना फिर कहाँ ।।



तोड़ते वो आइनों को बारहा इस फिक्र में ।

लुट गया है हुस्न का इतना खज़ाना फिर कहाँ… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on August 28, 2017 at 12:18am — 9 Comments

ग़ज़ल -- शरबती आंखों से अब पीना पिलाना फिर कहाँ

2122 2122 2122 212

वो तेरा छत पर बुलाकर रूठ जाना फिर कहाँ ।

वस्ल के एहसास पर नज़रें चुराना फिर कहाँ ।।



कुछ ग़ज़ल में थी कशिश कुछ आपकी आवाज थी ।

पूछता ही रह गया अगला तराना फिर कहाँ ।।



आरजू के दरमियाँ घायल न हो जाये हया ।

अब हया के वास्ते पर्दा गिराना फिर कहाँ ।।



कातिलाना वार करती वो अदा भूली नहीं ।

शह्र में चर्चा बहुत थी अब निशाना फिर कहाँ ।।



तोड़ते वो आइनों को बारहा इस फिक्र में ।

लुट गया है हुस्न का इतना खज़ाना फिर कहाँ… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on August 25, 2017 at 10:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल -

221 1221 1221 122



माना कि तेरे दिल की इनायत भी बहुत थी ।

पर साथ इनायत के हिदायत भी बहुत थी ।।



आते थे वो बेफिक्र मेरे शहर में अक्सर ।

तहजीब निभाने की रवायत भी बहुत थी ।।



महंगे मिले हैं लोग मुहब्बत के सफ़र में ।

यह बात अलग है कि रिआयत भी बहुत थी।।



चेहरे को पढा उसने कई बार नज़र से ।

महफ़िल में तबस्सुम की किफ़ायत भी बहुत थी ।।



वो हार गए फिर से अदालत में सरेआम ।

हालाकि नजीरों की हिमायत भी बहुत थी ।।



छूटी हैं… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on August 23, 2017 at 9:00am — 9 Comments

ग़ज़ल - चाँद छिपता रहा फासले के लिए

212 212 212 212



इक नज़र क्या उठी देखने के लिए ।

चाँद छिपता गया फासले के लिए ।।



कोई सरसर उड़ा ले गई झोपड़ी ।

सोचिये मत मुझे लूटने के लिए ।।



मौत मुमकिन मेरी उसको आना ही है ।

दिन बचे ही कहाँ काटने के लिए ।।



जहर जो था मिला आपसे प्यार में ।

लोग कहते गए घूँटने के लिए ।।



रात आई गई फिर शहर हो गई ।

याद कहती रही जागने के लिए ।।



जब रकीबो से चर्चा हुई आपकी ।

फिर पता मिल गया ढूढने के लिए ।।



सज के आए हैं… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on August 22, 2017 at 6:00pm — 11 Comments

नए चेहरों की कुछ दरकार है क्या

1222 1222 122



नए चेहरों की कुछ दरकार है क्या ।

बदलनी अब तुम्हें सरकार है क्या ।।



बड़ी मुश्किल से रोजी मिल सकी है ।

किया तुमने कोई उपकार है क्या ।।



सुना मासूम की सांसें बिकी हैं ।

तुम्हारा यह नया व्यापार है क्या ।।



इलेक्शन लड़ गए तुम जात कहकर ।

तुम्हारी बात का आधार है क्या ।।



यहां पर जिस्म फिर नोचा गया है ।

यहां भी भेड़िया खूंखार है क्या ।।



बड़ी शिद्दत से मुझको पढ़ रहे हो ।

मेरा चेहरा कोई अखबार है क्या…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on August 20, 2017 at 4:30pm — 12 Comments

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