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Naveen Mani Tripathi's Blog (292)

ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

कुछ मुहब्बत कुछ शरारत और कुछ धोका रहा ।

हर अदा ए इश्क़ का दिल तर्जुमा करता रहा ।।

याद है अब तक ज़माने को तेरी रानाइयाँ ।

मुद्दतों तक शह्र में चलता तेरा चर्चा रहा ।।

पूछिए उस से भी साहिब इश्क़ की गहराइयाँ ।

जो किताबों की तरह पढ़ता कोई चहरा रहा ।।

वो मेरी पहचान खारिज़ कर गया है शब के बाद ।

जो मेरे खाबों में आकर गुफ्तगू करता रहा ।।

साजिशें रहबर की थीं या था मुकद्दर का कसूर ।

ये मुसाफ़िर…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 9, 2019 at 12:33am — No Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

हर इक सू से सदा ए सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।

सुना है इस वतन को बेटियां अच्छी नहीं लगतीं ।।

न जाने कितने क़ातिल घूमते हैं शह्र में तेरे ।

यहाँ कानून की खामोशियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।।

सियासत के पतन का देखिये अंजाम भी साहब ।

दरिन्दों को मिली जो कुर्सियां अच्छी नहीं लगतीं।।

वो सौदागर है बेचेगा यहाँ बुनियाद की ईंटें ।

बिकीं जो रेल की सम्पत्तियां अच्छी नहीं लगतीं ।।

बिकेगी हर इमारत…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 4, 2019 at 2:02am — 7 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 122

न जाने किधर जा रही ये डगर है ।

सुना है मुहब्बत का लम्बा सफर है ।।

मेरी चाहतों का हुआ ये असर है ।

झुकी बाद मुद्दत के उनकी नज़र है ।।

नहीं यूँ ही दीवाने आए हरम तक ।

इशारा तेरा भी हुआ मुख़्तसर है ।।

यहाँ राजे दिल मत सुनाओ किसी को ।

ज़माना कहाँ रह गया मोतबर है ।।

है साहिल से मिलने का उसका इरादा ।

उठी जो समंदर में ऊंची लहर है ।।

है मकतल सा मंजर हटा जब से चिलमन…

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Added by Naveen Mani Tripathi on November 14, 2019 at 5:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल -

1212 1122 1212 22/112

न पूछिये कि वो कितना सँभल के देखते हैं ।

शरीफ़ लोग मुखौटे बदल के देखते हैं ।।

अज़ीब तिश्नगी है अब खुदा ही खैर करे ।

नियत से आप भी अक्सर फिसल के देखते हैं ।।

पहुँच रही है मुहब्बत की दास्ताँ उन तक ।

हर एक शेर जो मेरी ग़ज़ल के देखते हैं ।।

ज़नाब कुछ तो शरारत नज़र ये करती है ।

यूँ बेसबब ही नहीं वो मचल के देखते हैं ।।

गुलों का रंग इन्हें किस तरह मयस्सर हो…

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Added by Naveen Mani Tripathi on November 6, 2019 at 2:51pm — 2 Comments

ग़ज़ल - कुबूल है

1212 1212 1212 1212

शराब जब छलक पड़ी तो मयकशी कुबूल है ।

ऐ रिन्द मैकदे को तेरी तिश्नगी कुबूल है ।

नजर झुकी झुकी सी है हया की है ये इंतिहा ।

लबों पे जुम्बिशें लिए ये बेख़ुदी कुबूल है ।।

गुनाह आंख कर न दे हटा न इस तरह नकाब ।

जवां है धड़कने मेरी ये आशिकी कबूल है ।।

यूँ रात भर निहार के भी फासले घटे नहीं ।

ऐ चाँद तेरी बज़्म की ये बेबसी कुबूल है ।।

न रूठ कर यूँ जाइए मेरी यही है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on September 24, 2019 at 9:30pm — 2 Comments

लेती है इम्तिहान ये उल्फ़त कभी कभी

221 2121 1221 212

लेती है इम्तिहान ये उल्फ़त कभी. कभी ।

लगती है राहे इश्क़ में तुहमत कभी कभी ।।

आती है उसके दर से हिदायत कभी कभी ।

होती खुदा की हम पे है रहमत कभी कभी ।।

चहरे को देखना है तो नजरें बनाये रख ।

होती है बेनक़ाब सियासत कभी कभी ।।

यूँ ही नहीं हुआ है वो बेशर्म दोस्तों ।

बिकती है अच्छे दाम पे गैरत कभी कभी ।।

मुझ पर सितम से पहले ऐ क़ातिल तू सोच ले ।

देती सजा ए मौत है कुदरत कभी कभी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on August 14, 2019 at 6:42pm — 4 Comments

ग़ज़ल

212 212 212 212

जब से ख़ामोश वो सिसकियां हो गईं ।

दूरियां प्यार के दरमियाँ हो गईं ।।

कत्ल कर दे न ये भीड़ ही आपका ।

अब तो क़ातिल यहाँ बस्तियाँ हो गईं ।।

आप ग़मगीन आये नज़र बारहा ।

आपके घर में जब बेटियां हो गईं ।।

कैसी तक़दीर है इस वतन की सनम ।

आलिमों से खफ़ा रोटियां हो गईं ।।

फूल को चूसकर उड़ गईं शाख से ।

कितनी चालाक ये तितलियां हो गईं ।।

दर्दो गम पर…

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Added by Naveen Mani Tripathi on July 28, 2019 at 12:17am — 2 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

.

पूछिये मत कि हादसा क्या है ।

पूछिये दिल मेरा बचा क्या है।।

दरमियाँ इश्क़ मसअला क्या है।

तेरी उल्फ़त का फ़लसफ़ा क्या है

सारी बस्ती तबाह है तुझसे ।

हुस्न तेरी बता रजा क्या है ।।

आसरा तोड़ शान से लेकिन ।

तू बता दे कि फायदा क्या है ।।

रिन्द के होश उड़ गए कैसे ।

रुख से चिलमन तेरा हटा क्या है।।

बारहा पूछिये न दर्दो गम ।

हाले दिल आपसे छुपा क्या है ।।



फूँक कर…

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Added by Naveen Mani Tripathi on July 16, 2019 at 12:00am — 2 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 212

दुश्मनी हमसे  निकाली  जाएगी ।

बेसबब इज्ज़त उछाली जाएगी ।।

नौकरी मत  ढूढ़  तू इस मुल्क में ।

अब तेरे हिस्से की थाली जाएगी ।।

लग रहा है अब रकीबों के लिए ।

आशिकी साँचे में ढाली जाएगी ।।

चाहतें   अब  क्या  सताएंगी   उसे ।

जब कोई ख़्वाहिश न पाली जाएगी ।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on July 11, 2019 at 12:12am — 4 Comments

ग़ज़ल

221 2121 1221 212

मुद्दत के बाद आई है ख़ुश्बू सबा के साथ ।

बेशक़ बहार होगी मेरे हमनवा के साथ ।।

शायद मेरे सनम का वो इज़हारे इश्क था ।

यूँ ही नहीं झुकी थीं वो पलकें हया के साथ ।।

वह शख्स दे गया है मुझे बेवफ़ा का नाम ।

जो ख़ुद निभा सका न मुहब्बत वफ़ा के साथ ।।

माँगी मदत जरा सी तो लहज़े बदल गए ।

अब तक मिले जो लोग हमें मशविरा के साथ ।।

आँखों में साफ़ साफ़ सुनामी की है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on July 8, 2019 at 11:00am — 10 Comments

ग़ज़ल

एक खास बह्र  पर ग़ज़ल

122 122 121 22

तेरे हुस्न पर अब शबाब तय है ।

खिलेगा चमन में गुलाब तय है ।।

अगर हो गयी है तुझे मुहब्बत ।

तो फिर मान ले इज्तिराब तय है ।।

अभी तो हुई है फ़क़त बगावत ।

नगर में तेरे इंकलाब तय है ।।

बचा लीजिये आप कुछ तो पानी ।

मयस्सर न होगा ये आब तय है ।।

किया मुद्दतों तक वो जी हुजूरी ।

सुना है कि जिसका खिताब तय है ।।

अगर आ…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 26, 2019 at 12:01am — 3 Comments

आइना

2122 2122 2122 212



अब न चहरे की शिकन कर दे उजागर आइना ।

देखता रहता है कोई छुप छुपा कर आइना ।।

गिर गया ईमान उसका खो गये सारे उसूल ।

क्या दिखायेगा उसे अब और कमतर आइना ।।

सच बताने पर सजाए मौत की ख़ातिर यहां ।

पत्थरो से तोड़ते हैं लोग अक्सर आइना ।।

आसमां छूने लगेंगी ये अना और शोखियां ।

जब दिखाएगा तुझे चेहरे का मंजर आइना ।।

अक्स तेरा भी सलामत क्या रहेगा सोच ले ।

गर यहां तोड़ा कभी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 25, 2019 at 11:56pm — 3 Comments

ग़ज़ल



2122 2122 212

हुस्न का बेहतर नज़ारा चाहिए ।

कुछ तो जीने का सहारा चाहिए ।।

हो मुहब्बत का यहां पर श्री गणेश ।

आप का बस इक इशारा चाहिए ।।



हैं टिके रिश्ते सभी दौलत पे जब ।

आपको भी क्या गुजारा चाहिए ।।

है किसी तूफ़ान की आहट यहां ।

कश्तियों को अब किनारा चाहिए ।।

चाँद कायम रह सके जलवा तेरा ।

आसमा में हर सितारा चाहिए ।।

फर्ज उनका है तुम्हें वो काम दें ।

वोट जिनको भी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 19, 2019 at 1:12am — 8 Comments

ग़ज़ल

221 2121 1221 212

ता-उम्र उजालों का असर ढूढ़ता रहा ।

मैं तो सियाह शब में सहर ढूढ़ता रहा ।।

अक्सर उसे मिली हैं ये नाकामयाबियाँ ।

मंजिल का जो आसान सफ़र ढूढ़ता रहा ।।

मुझको मेरा मुकाम मयस्सर हुआ कहाँ ।

घर अपना तेरे दिल में उतर ढूढ़ता रहा ।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on June 16, 2019 at 1:10am — 1 Comment

ग़ज़ल- आरजू ही नहीं जब हुई मुख़्तसर

212 212 212 212

कीजिये मत अभी रोशनी मुख़्तसर ।

आदमी कर न ले जिंदगी मुख़्तसर ।।

इश्क़ में आपको ठोकरें क्या लगीं ।

दफ़अतन हो गयी बेख़ुदी मुख़्तसर ।।

नौजवां भूख से टूटता सा मिला ।

देखिए हो गयी आशिक़ी मुख़्तसर ।।

गलतियां बारहा कर वो कहने लगे ।

क्यूँ हुई मुल्क़ में नौकरी मुख़्तसर ।।

कैसे कह दूं के समझेंगे जज़्बात को ।

जब वो करते नहीं बात ही मुख़्तसर ।।

सिर्फ शिक़वे गिले में सहर हो गयी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 30, 2019 at 6:30pm — No Comments

ग़ज़ल - दिल मे भगवान का डर पैदा कर

2122 1122 22

आपने जुमलों में असर पैदा कर ।

कुछ तो जीने का हुनर पैदा कर ।।

दिल जलाने की अगर है ख्वाहिश ।

तू भी आंखों में शरर पैदा कर ।।

गर ज़रूरत है तुझे ख़िदमत की ।

मेरी बस्ती में नफ़र पैदा कर ।।

हर सदफ जिंदगी तो मांगेगी ।

इस तरह तू न गुहर पैदा कर ।।

देखता है वो तेरा जुल्मो सितम।

दिल में भगवान का डर पैदा कर ।।

अब तो सूरज से है तुझे खतरा…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 16, 2019 at 1:35pm — 4 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

फासले    बेकरार    करते   हैं ।

और   हम   इतंजार  करते   हैं ।।

इक तबस्सुम को लोग जाने क्यूँ ।

क़ातिलों में सुमार करते हैं ।।

सिर्फ धोखा मिला ज़माने से ।

जब कभी ऐतबार करते हैं ।।

मैं तो इज्ज़त बचा के चलता हूँ ।

और वह तार तार करते हैं ।।

उम्र गुज़री है बस चुकाने में ।

आप जब भी उधार करते हैं।।

उनको गफ़लत हुई यही यारो…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 15, 2019 at 3:47pm — 2 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 212

जब लबों पर वह तराना आ गया ।

याद फिर गुजरा ज़माना आ गया ।।

शब के आने की हुई जैसे खबर ।

जुगनुओं को जगमगाना आ गया ।।

मैकदे को शुक्रिया कुछ तो कहो।

अब तुम्हें पीना पिलाना आ गया ।।

वस्ल की इक रात जो मांगी यहां ।

फिर तेरा लहजा पुराना आ गया ।।

छोड़ जाता मैं तेरी महफ़िल मगर ।

बीच मे ये दोस्ताना आ गया ।।

जब भी गुज़रे हैं गली से वो मेरे ।

फिर तो…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 5, 2019 at 11:43pm — 3 Comments

ग़ज़ल

221 1222 22 221 1222 22

गुज़री है मेरे दिल पर क्या क्या अब हिज्र का आलम पूछ रहे ।।

मालूम तुम्हें जब गम है मेरा क्यूँ आंखों का पुरनम पूछ रहे ।।1

इक आग लगी है जब दिल में चहरे पे अजब सी बेचैनी ।

इकरारे मुहब्बत क्या होगी ये बात वो पैहम पूछ रहे ।।2

कुछ फ़र्ज़ अता कर दे जानां कुछ खास सवालातों पर अब ।

होठों पे तबस्सुम साथ लिए जो वस्ल का आगम पूछ रहे ।।3

हालात मुनासिब कौन कहे जलती है जमीं जलता भी है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 3, 2019 at 12:30am — 3 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 12

मुहब्बत की ख़ातिर ज़िगर कीजिये ।

अभी से न यूँ चश्मे तर कीजिये ।।

गुजारा तभी है चमन में हुजूऱ ।

हर इक ज़ुल्म को अपने सर कीजिये ।।

करेगी हक़ीक़त बयां जिंदगी ।

मेरे साथ कुछ दिन सफ़र कीजिये ।।

पहुँच जाऊं मैं रूह तक आपकी ।

ज़रा थोड़ी आसां डगर कीजिये ।।

वो पढ़ते हैं जब खत के हर हर्फ़ को ।

तो मज़मून क्यूँ मुख़्तसर कीजिए ।।

लगे मुन्तज़िर गर…

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Added by Naveen Mani Tripathi on April 12, 2019 at 10:34pm — 2 Comments

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