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बात दिल मे ही ठहर जाती है

2122 1122 22


छू के साहिल को लहर जाती है ।
रेत नम अश्क़ से कर जाती है ।।

सोचता हूँ कि बयाँ कर दूं कुछ ।
बात दिल में ही ठहर जाती है ।।

याद आने लगे हो जब से तुम ।
बेखुदी हद से गुजर जाती है ।।

कुछ तो खुशबू फिजां में लाएगी ।
जो सबा आपके घर जाती है ।।



कितनी ज़ालिम है तेरी पाबन्दी ।
यह जुबाँ रोज क़तर जाती है ।।

हुस्न को देख लिया है जब से ।
तिश्नगी और सवर जाती है।।

ढूढिये आप जरा शिद्दत से ।
दिल तलक कोई डगर जाती है ।।

कर गया जख्म की बातें कोई ।
रूह सुनकर ही सिहर जाती है ।।

जब भी फिरती हैं निगाहें उसकी ।
कोई तकदीर सुधर जाती है ।।

आशिकों तक वहाँ जाने कैसे ।
तेरे आने की ख़बर जाती है ।।

देख कर आपका लहजा साहिब ।
चोट मेरी भी उभर जाती है ।।

जब निकलता हूँ तेरे कूचे से ।
कोई सूरत तो निखर जाती है ।।

कोशिशें कर चुका हूँ लाखों पर ।
ये नज़र फिर भी उधर जाती है ।।

बे अदब हो गयी है याद तेरीे ।
बे सबब दिल में उतर जाती है ।।

जेब का हाल समझ कर अक्सर ।
आशिकी हम से मुकर जाती है ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on February 21, 2018 at 3:17pm

आ0 लक्ष्मण धामी साहब हार्दिक आभार

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 21, 2018 at 9:53am
  • आ. भाई नवीन जी, सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on February 19, 2018 at 11:41am

 आ0 राम अवध विश्वकर्मा जी बह्र मुझे तो ठीक लग रही है । सम्भवतः 3 और 4 शेर का ओला दुरुस्त है ।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on February 18, 2018 at 3:06pm

आदर्णीय त्रिपाठी जी खूबसूरत ग़ज़ल कहने के लिये बधाई। शेर नं 3 और 4 के ऊला मिसरा के बह्र को शायद एक बार पुन: अवलोकन करने की जरूरत है।

Comment by रक्षिता सिंह on February 18, 2018 at 12:20pm

आदरणीय नवीन जी नमस्कार,

बहुत खूबसूरत गजल, बे अदब हो गयी है याद तेरी - बे सबब दिल में उतर जाती है।

मुबारकबाद कुबूल फरमायें। 

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